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कहानी: चादरें

नई नवेली बहू हर दिन चादरें बदलती थी…
जब तक कि एक दिन सास कमरे में दाखिल हुई — और बिस्तर पर ख़ून के दाग़ देख कर जड़ हो गई…
मेरा बेटा आरव अभी-अभी शादी के सात दिन पूरे कर चुका था, जब मैंने कुछ अजीब महसूस किया।
उसकी पत्नी मायरा — देखने में परफ़ेक्ट लगती थी।
संस्कारवान, विनम्र, हर काम में निपुण।
सुबह मंदिर में दिया जलाना, बुज़ुर्गों के पैर छूना, और पूरे मोहल्ले में सबको “नमस्ते आंटी” कहकर मुस्कुराना — सब कुछ जैसे किसी आदर्श बहू की किताब से निकला हो।
शादी में रिश्तेदार भी बोले थे, “आपको तो लक्ष्मी जैसी बहू मिली है।”
और मैंने भी मन ही मन कहा था — “सच है।”
लेकिन…
हर सुबह, मायरा वही काम दोहराती थी — बिस्तर की चादरें, तकियों के खोल, यहाँ तक कि रजाई का कवर भी। सब कुछ उतारकर वह आँगन में ले जाती, कुएँ के पानी में भिगोती, साबुन से रगड़ती — और फिर दोबारा बिछा देती, जैसे कोई अनुष्ठान हो।
पहले तो मैंने सोचा, शायद सफ़ाई की शौकीन है। पर हर दिन? बिना चूके? कुछ तो ग़लत था।
एक शाम मैंने पूछा — “मायरा, बेटा… तुम रोज़ चादरें क्यों बदलती हो?”
वो मुस्कुराई, धीरे से बोली — “माँजी, मुझे धूल से एलर्जी है। साफ़ बिस्तर में चैन से नींद आती है।”
उसकी आवाज़ मीठी थी, पर मेरे भीतर एक बेचैनी उठी। क्योंकि ये वही नई चादरें थीं जो हमने शादी में ख़रीदी थीं। कभी धूल नहीं जमी, न कोई बीमारी।
फिर भी… वो धोती रही, जैसे किसी अदृश्य दाग़ को मिटाने की कोशिश कर रही हो।
मैंने ठान लिया — सच्चाई जाननी ही पड़ेगी।
अगली सुबह मैंने दिखावे के लिए कहा — “मैं सब्ज़ी लेने बाज़ार जा रही हूँ।” दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया, ताकि उसे लगे मैं निकल गई।
फिर धीरे-धीरे वापस आई, और उसके कमरे का दरवाज़ा खोला।
एक तेज़ धातु जैसी गंध ने मुझे झटका दिया। दिल धड़कने लगा।
मैंने चादर उठाई… और वहीं जम गई।
गद्दे पर गहरे भूरे धब्बे — ख़ून के निशान। पुराने, सूखे, लेकिन फिर भी ताज़ा दर्द की गंध लिए हुए।
मेरे हाथ काँप रहे थे जब मैंने बिस्तर के पास की दराज़ खोली। अंदर — पट्टियाँ, एंटीसेप्टिक, और एक औरत का कुर्ता — पूरा सूखे ख़ून से सख्त हो चुका था।
सबूत वहीं था। किसी ऐसे राज़ का जो बरसों से किसी ने दबा रखा था।
मैं पीछे हटी, साँसें तेज़ हो गईं, दिल जैसे सीने से बाहर निकल आए।
कुछ तो था इस घर में… जो ठीक नहीं था।…

मैंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया और लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे में आकर बैठ गई। हाथ अब भी काँप रहे थे। आँखों के सामने वही धब्बे घूम रहे थे—सूखा हुआ ख़ून, जैसे किसी चीख़ को ज़बरदस्ती चुप करा दिया गया हो। उस दिन मैं किसी से कुछ नहीं बोली। आरव दफ़्तर चला गया, मायरा रोज़ की तरह रसोई में लगी रही—शांत, मुस्कुराती हुई, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन अब उसकी हर मुस्कान मुझे किसी नक़ाब जैसी लग रही थी।

रात को जब सब सो गए, मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही। दिमाग़ में सवालों का तूफ़ान था—क्या मेरा बेटा किसी ज़ुल्म में शामिल है? क्या मायरा किसी डर में जी रही है? या फिर… कोई और सच्चाई, जो मेरे सोच से भी परे है?

अगली सुबह मैंने मायरा को अपने कमरे में बुलाया।
“बेटी,” मैंने सामान्य दिखने की कोशिश की, “तू थकी-थकी लग रही है। कुछ परेशानी है क्या?”
वह एक पल के लिए रुकी। उसकी आँखों में कुछ टूटा हुआ सा चमका, फिर उसने नज़रें झुका लीं।
“नहीं माँजी… सब ठीक है,” वह बोली।
“झूठ मत बोल,” मेरे मुँह से अनायास निकल गया। “घर की औरतें झूठ पहचान लेती हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। उसकी उंगलियाँ दुपट्टे को मरोड़ने लगीं। कुछ सेकंड बाद उसने धीरे से कहा,
“अगर मैं सच बताऊँ… तो क्या आप मुझसे नफ़रत करेंगी?”

मेरा दिल बैठ गया।
“नफ़रत?” मैंने कहा, “बेटी, माँ नफ़रत नहीं करती। डरती है… अपने बच्चों के लिए।”

वह फूट-फूट कर रोने लगी। ऐसा रोना, जिसमें आवाज़ नहीं होती, बस कंधे काँपते हैं।
“माँजी,” उसने सिसकते हुए कहा, “मैं परफ़ेक्ट नहीं हूँ… जैसी सबको लगती हूँ।”
मैंने उसका हाथ थाम लिया।
“कोई भी परफ़ेक्ट नहीं होता,” मैंने कहा, “पर सच बोलने की हिम्मत परफ़ेक्शन से बड़ी होती है।”

उसने गहरी साँस ली, जैसे बरसों से रोकी हुई हवा बाहर निकाल रही हो।
“शादी से पहले… मेरे साथ एक हादसा हुआ था,” वह बोली।
मैंने कुछ नहीं कहा।
“मेरे मामा के घर… एक आदमी था,” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “सब उस पर भरोसा करते थे। उसने कहा था, मुझे पढ़ाई में मदद करेगा… और फिर…”
वह रुक गई।
“और फिर उसने मुझे कमरे में बंद कर दिया,” वह फुसफुसाई। “मैंने चिल्लाया, हाथ-पैर मारे… लेकिन कोई नहीं आया।”

मेरे कानों में सीटी बजने लगी। दिल जैसे फट जाएगा।
“उस दिन से,” उसने कहा, “मुझे ख़ून से डर नहीं लगता, माँजी… उससे मुझे अपनी ताक़त याद आती है।”
मैंने उसे देखा।
“उसने मुझे मारा नहीं,” वह बोली, “लेकिन मैंने खुद को मारा। मैंने ब्लेड उठाया… ताकि दर्द मेरे काबू में रहे, किसी और के नहीं।”
मेरे मुँह से चीख़ निकलते-निकलते रह गई।

“वो दाग़…” मैंने कहा।
“हाँ,” उसने सिर हिलाया, “मेरे अपने हैं। जब भी डर बढ़ता है, मैं खुद को चोट पहुँचाती हूँ… और फिर उन चादरों को धोती हूँ, जैसे अपनी यादें धो रही हूँ।”

मैं उसे सीने से लगा लिया। मेरी साड़ी उसके आँसुओं से भीग गई।
“तूने आरव को बताया?”
“नहीं,” उसने सिर हिलाया। “मैं नहीं चाहती थी कि वो मुझे टूटी हुई समझे।”

उस पल मुझे अपने बेटे पर गर्व हुआ—और डर भी।
“आरव टूटी हुई चीज़ों को फेंकता नहीं,” मैंने कहा, “वो उन्हें जोड़ता है।”

शाम को जब आरव घर आया, मैंने उसे बैठने को कहा।
“माँ, क्या बात है?”
मैंने उसकी आँखों में देखा।
“आज तुम्हें सच सुनना होगा,” मैंने कहा।

मायरा ने खुद उसे सब बताया। हर शब्द, हर आँसू, हर डर। आरव की मुट्ठियाँ भींच गईं।
“मुझे माफ़ कर दो,” मायरा बोली, “मैं डर गई थी।”
आरव उठकर उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
“माफ़ी?” वह बोला, “माफ़ी मुझे माँगनी चाहिए… कि मैं तुम्हारा दर्द पढ़ नहीं पाया।”

वह रात घर में रोने की थी—लेकिन अकेलेपन की नहीं।
अगले दिन आरव ने छुट्टी ली।
“हम डॉक्टर के पास चलेंगे,” उसने कहा।
मायरा घबरा गई।
“नहीं… लोग क्या कहेंगे?”
“लोग नहीं जीते, मायरा,” आरव बोला, “हम जीते हैं।”

डॉक्टर ने कहा—यह दर्द पागलपन नहीं, ज़ख़्म है। और ज़ख़्म का इलाज होता है।
धीरे-धीरे मायरा ने खुद को चोट पहुँचाना छोड़ा। चादरें अब भी बदली जाती थीं—लेकिन मजबूरी से नहीं, पसंद से।
एक दिन मैंने देखा—गद्दे पर कोई दाग़ नहीं था।
और मायरा की आँखों में भी नहीं।

महीनों बाद, एक सुबह उसने मुझसे कहा,
“माँजी, आज मैं चादर नहीं बदलूँगी।”
मैं मुस्कुराई।
“क्यों?”
“क्योंकि आज मैं भाग नहीं रही,” वह बोली।

उस घर में पहली बार मुझे लगा—हम सच में एक परिवार हैं।
सीखा यही—परफ़ेक्शन नक़ाब है, और सच रिश्तों को मजबूत करता है।
और सबसे बड़ा चमत्कार… तब होता है, जब कोई औरत अपनी चुप्पी तोड़ देती है।
 
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