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गाजीपुर: दो राजनीतिक योद्धा अफजाल अंसारी व ओमप्रकाश सिंह का मिलन 2019 में क्या गुल खिलायेगा

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गाजीपुर जिले के दो राजनीतिक योद्धा अफजाल अंसारी और ओमप्रकाश सिंह का पुर्नमिलन 2019 में क्‍या गुल खिलायेगा इसपर चर्चा जोरों पर है। ये दोनों योद्धा जब साथ थें तब जिले में भाजपा की नर्सरी नही लग पा रही थी, लगती भी थी तो छोड़े दिन के बाद मुरझा जाती थी। इन दोनों राजनीतिक योद्धाओं के अलग होते ही भाजपा का पौधा बटवृक्ष बन गया। अब पूरे जिले में कब्‍जा करने का कवायद चल रही है। दोनों योद्धा भी अलग होते ही राजनीति के हासिये पर आ गये और अपनी अस्‍तित्‍व को बचाये रखने के लिए संघर्ष करने लगे हैं। ऐसे में राजनीति के हर गुण में माहिर दोनों योद्धा एक साथ दिख रहे हैं। उनके एक साथ होने की खबर जंगल में आ की तरह फैल गयी है। 

अब देखना है कि यह मिलन 2019 में क्‍या गुल खिलायेगा। समाजवादी राजनीति में अफजाल अंसारी और ओमप्रकाश सिंह एक-दूसरे के काफी शुभचिंतक थें और दोनों मिलकर समाजवादी झंडा पूरे जिले में बुलंद कर दिया था। दोनों की मित्रता पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना रहता था। लेकिन भाजपा विधायक कृष्‍णानंद राय हत्‍याकांड के बाद दोनों के संबंधों में दरार आ गया। संसद में परमाणु निति पर सपा का साथ न देने के कारण मुलायम सिंह ने अफजाल अंसारी को छह साल के लिए पार्टी के बाहर निकाल दिया। सूत्रों के अनुसार भाजपा विधायक कृष्‍णानंद राय हत्याकांड में अफजाल अंसारी के जेल में जाने के बाद ओमप्रकाश सिंह ने राजनीतिक सहयोग नही दिया था जिसकी वजह से दोनों में दरारे आ गयी थीं। 

सपा ने अफजाल अंसारी का‍ टिकट लोकसभा चुनाव में काटकर राधेमोहन सिंह को दे दिया। अंसारी बंधु भी हाथी पर सवार होकर चुनाव लड़े लेकिन चुनाव हार गये। अपने अपमान का बदला लेने के लिए अंसारी बंधुओं ने 2007 के विधानसभा चुनाव में ओमप्रकाश सिंह को चुनाव हरवा दिया। यह ओमप्रकाश सिंह के जीवन में पहली हार थी। अपने हार से तिलमिलायें ओमप्रकाश सिंह ने अंसारी बंधुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जिसका भरपूर फायदा भाजपा को मिला। 

2014 में लोकसभा के चुनाव में मनोज सिन्‍हा भारी मतों से विजयी हुए। इसके बाद 2016 में एक बार फिर अंसारी बंधु कौमी एकता का विलय सपा में शिवपाल यादव के अध्‍यक्षता में करा दिया। लेकिन तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने पारिवारिक झगड़े की वजह से अंसारी बंधुओं का सदस्‍यता रद्द करा दिया। पारिवारिक कलह में ओमप्रकाश सिंह को कैबिनेट मंत्री मंडल से बर्खाश्‍त कर दिया गया। अंसारी बंधु हाथी पर चढ़कर विधानसभा का चुनाव लडे़। मऊ में मुख्‍तार अंसारी विजयी हुए लेकिन मुहम्‍मदाबाद और घोसी विधानसभा से उन्‍हे हार का सामना करना पड़ा। ओमप्रकाश सिंह भी समाजवादी टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन तीसरे नंबर रहे। आपसी लड़ाई में भाजपा की यूपी में सरकार बन गयी और दोनों लोग राजनीतिक हासिये पर आ गये। 

जिला पंचायत अध्‍यक्ष के चुनाव में सहयोग देकर व निकाय चुनाव में चार सीटें जीतकर अंसारी बंधुओं ने ईज्‍जत बचा ली। लेकिन ओमप्रकाश सिंह जमानियां और दिलदारनगर दोनों सीटें हार गये। इस बीच दोनों योद्धाओं के संबंधों में एक बार फिर सुधार हुआ और हाल-चाल, न्‍यौता आदि शुरु हो गया। दोनों परिवारों के युवराज भी आपस में विचार अदान-प्रदान करने लगे। इस संदर्भ में पूर्व सांसद अफजाल अंसारी ने गाजीपुर न्‍यूज  को बताया कि मैं समझौतावादी इंसान हूं, जो जिस भेष में मिलता है मैं वैसा व्‍यवहार करता हूं। जो मित्र के स्‍वभाव में मिलता है उसकी हर मदद करता हूं। जो प्रतिद्वंदी के स्‍वभाव के मिलता है उसका हर स्‍तर पर विरोध करता हूं। इधर अफजाल अंसारी और ओमप्रकाश सिंह में काफी घनिष्‍ठता देखी जा रही है जिसे लेकर जिले के चट्टी-चौराहों के चायखानों व शहर के ड्राइंग रुमों तक चर्चा हो रही है कि दोनों का मिलन 2019 में क्‍या राजनीतिक गुल खिलायेगा। अगर सपा-बसपा का गठबंधन होगा तो कौन कहा से लड़ेगा इसपर भी चर्चा जोरों पर है।

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