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एक स्कूटी, मियां-बीवी, तीन बच्चे और 1650 किलोमीटर लंबा सफर

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गोरखपुर. दो महीने तक मलेरिया से तप कर कमजोर हुआ बदन। उस पर 1650 किलोमीटर लंबे सफर की मजबूरी। बीवी और तीन बच्चों के साथ स्कूटी पर। कितना मुश्किल रहा होगा महाराष्ट्र के कल्याण से गोरखपुर के गांव फरसाड़ तक पहुंचना। देवनारायण यादव ने यह हिम्मत की। छह दिन स्कूटी चलाकर वह गांव पहुंचे तो पत्नी-बच्चे थक कर चूर हो चुके थे। लेकिन देव को पूरी रात नींद नहीं आई। थकान के बावजूद। उनकी आंखों में लंबे, सूने, काले हाईवे की छाया के सिवा बस आंसू थे। हे भगवान! तुम्हारी दुनिया में इतनी तकलीफें हैं ... और उससे भी ज्यादा अच्छे लोग।

देवनारायण के इस सफर ने तमाम गलतफहमियां साफ कर दी हैं। सफर में उनका वास्ता तीन प्रदेशों के 15 जिलों के सैकड़ों लोगों से पड़ा। ऐसा लगा जैसे हर आदमी उनकी मदद के लिए वहां था। खासकर मध्यप्रदेश में। जहां हर 20-25 किलोमीटर पर लोग भोजन कराते मिले। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में जरूर उन्हें दो बार भोजन की जगह बिस्किट खाकर काम चलाना पड़ा। देवनारायण कहते हैं- 'चलने से पहले मैं डर रहा था। रास्ते में चोर-लुटेरे मिल सकते हैं। पुलिस परेशान करेगी। ढाबे बंद होंगे तो क्या खाएंगे? लेकिन छह दिन-पांच रातें सड़क पर काट कर लगा, दुनिया मददगारों से भरी है। मैं एक बड़ी पॉलीथिन लेकर चला था। रात में हम सब कहीं पेट्रोलपंप में सोए तो कहीं मंदिर में। ज्यादातर जगह स्थानीय लोगों ने भोजन दिया। पानी पिलाया। जगह और सुरक्षा दी।

कहीं-कहीं तो कांवर यात्रा जैसे इंतजाम मिले
देवनारायण ने जलगांव के बाद थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लंच पैकेट का वितरण देखा। पूरे मध्यप्रदेश में ऐसा इंतजाम था, जैसे कांवर यात्रा के भंडारे लगे हों। अलबत्ता झांसी से आगे आने पर दिक्कत हुई। वहां एक वक्त खाने की जगह बिस्किट खाकर भूख मिटाई। उसी दिन औरैया में प्रवासियों का बड़ा हादसा हुआ था। पुलिस कहीं रुकने नहीं दे रही थी। तब लगातार 350 किलोमीटर स्कूटी चलानी पड़ी। कानपुर पहुंचे तो समाजसेवियों ने लंच पैकेट दिए। ठहरने की जगह दी। बुखार की दवा भी।

15 किलोमीटर घसीटनी पड़ी पंक्चर स्कूटी
झांसी से कुछ पहले टायर पंक्चर हो गया। राहगीरों ने कहा कि आगे पंक्चर बन जाएगा। स्कूटी घसीटते हुए बढ़े तो 15 किलोमीटर चलना पड़ा। बनाने वाला घर पर था। भोजन करने जा रहा था। मैंने परेशानी बताई तो भोजन छोड़कर उठ गया। अच्छा इंसान था। उसने मजबूरी का फायदा नहीं उठाया। केवल 20 रुपये लिए और पंक्चर जोड़ दिया।  

यादव परिवार का सफर
12 मई की शाम 5 बजे कल्याण से चले। एक परिचित से पांच हजार रुपये उधार लेकर। पत्नी सुनीता, बेटी काजल (12), जाह्नवी (5) और बेटे शुभम (10) के साथ। दो बैग में कपड़े और थोड़े-से बिस्कुट और नमकीन लेकर। रात में 1 बजे जलगांव बस स्टेशन परिसर में सोए। सुबह फिर चले और रात तक इंदौर पहुंचे। यहां पेट्रोल पंप में ठिकाना मिला। अगली रात झांसी में एक मंदिर में कटी। अगले पड़ाव कानपुर में एक पेट्रोल पंप में शरण मिली। अंतिम पड़ाव अयोध्या था, जहां एक मंदिर ने उन्हें ठहरने की जगह दी। अयोध्या से वह आजमगढ़ होते हुए दोहरीघाट पहुंचे। वहां से बड़हलगंज के पटना चौराहे पर वह रात दो बजे पहुंचे। कहीं किसी ने नहीं रोका। वह गांव पहुंच गए। गुरुवार को उनके परिवार की कोरोना जांच की गई है।

भुखमरी की नौबत आई तो गांव भागे
देवनारायण 10 साल से कल्याण में रहकर इलेक्ट्रीशियन का काम करते थे। किराये की खोली में पत्नी और तीन बच्चों के साथ। जनवरी में उन्हें मलेरिया हुआ। दो महीने में स्वस्थ्य हुए तब तक लॉकडाउन हो गया। सारी बचत खर्च हो गई। मांग कर गुजारा करने की नौबत आ गई। तब गांव आने का फैसला किया। बच्चे छोटे हैं, इसलिए पैदल नहीं निकले। हिम्मत करके स्कूटी पर परिवार संग निकले। छोटी बेटी को कभी बेटे के साथ खड़ा कर लेते तो कभी मां की गोद में बैठा देते। एक दिन में ढाई-तीन सौ किलोमीटर यात्रा कर पाते थे। यात्रा दुष्कर थी पर इसने तमाम सबक दिए।

तीन बार आवेदन किया पर टिकट नहीं मिला
मुम्बई और गोरखपुर प्रशासन से गुहार लगाई। ट्रेन के टिकट के लिए तीन बार प्रयास किया पर नहीं मिला। आखिरकार जोखिम भरा सफर स्कूटी से तय करना पड़ा। इस सफर में उन्होंने तीन हजार रुपये का पेट्रोल इस्तेमाल किया।

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