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गाजीपुर: कोरोना से डरे हुए मेडिकल स्टाफ को दिया हौसला और आज बन गए हैं रोल मॉडल डॉ. स्वतंत्र सिंह

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गाजीपुर। हर साल 1 जुलाई को डॉक्टर्स डे पूरे देश में मनाया जाता है। डॉक्टर को धरती पर भगवान का रूप कहा जाता है। वह कई लोगों को उनकी जिंदगी वापस लौटाते हैं। डॉक्टरों के समर्पण और ईमानदारी के प्रति सम्मान जाहिर करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। आज हम एक ऐसे डॉक्टर की बात करेंगे जो कोविड-19 योद्धा के रूप में कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। कोरोना के शुरुआती दौर में मेडिकल स्टाफ कोसों दूर भाग रहा था, तब गाजीपुर जिला चिकित्सालय गोरा बाजार में कार्यरत डॉ स्वतंत्र सिंह कोरोना से दो-दो हाथ करने के लिए आगे आए। 

उनकी मेहनत की वजह से जो मेडिकल स्टाफ कोरोना मरीजों का इलाज करने से पीछे हट रहा था आज वह मेडिकल स्टाफ डॉ स्वतंत्र सिंह की प्रेरणा से आगे बढ़ चढ़कर कोरोना मरीजों का इलाज करने में तत्पर दिख रहा है। डॉ स्वतंत्र सिंह की तत्परता और कार्य के प्रति निष्ठा व ईमानदारी की वजह से जनपद में अब तक करीब 280 मरीज स्वस्थ होकर अपने घरों को लौट चुके हैं। डॉ स्वतंत्र सिंह, गाजीपुर के रामपुर जीवन गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता स्वर्गीय बलभद्र सिंह डाक विभाग में कर्मचारी थे। गांव के 20 किलोमीटर की रेडियस में कोई भी स्वास्थ्य केंद्र या डॉक्टर न होने की वजह से पिता ने अपने पुत्र को डॉक्टर बनाने का सोचा और आज पिता के सपनों को सच करते हुए डॉ स्वतंत्र कुमार सिंह ने जनपद में अपने एक छोटे से कार्यकाल में अपनी एक अलग पहचान बना डाली। डॉ स्वतंत्र सिंह ने कहा कि उस वक्त डॉ आरबी राय और डॉ एके मिश्रा पिताजी के करीबी डॉक्टर थे जिन्हें वह आज भी अपना रोल मॉडल मानते हैं। 

डॉ स्वतंत्र सिंह की प्रारम्भिक, माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा गोरा बाजार स्थित सरस्वती शिशु मंदिर, मलिकपुरा नर्सरी स्कूल, चिल्ड्रन स्कूल आजमगढ़ में संपन्न हुई। इंटर की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने लगातार  पाँच साल तक सीपीएमटी परीक्षा की तैयारी की और साल 2006 में ऑल इंडिया पीएमटी त्रिपुरा में ज्वाइन किया। उन्होंने बताया कि पहली जॉइनिंग बीएसएफ में मेडिकल ऑफिसर के रूप में साल 2011-12 में एक माह के लिए हुयी थी। इसके पश्चात एम्स शिलांग में सर्जरी विभाग एक साल तक जेआरशिप किया। साल 2014 में जयपुर से एमडी किया। डॉ स्वतंत्र सिंह ने बताया कि कोरोना अस्पताल में ड्यूटी करते समय कई तरह के उतार-चढ़ाव देखने को मिले एक वक्त ऐसा भी आया जब इन्हें 14 दिनों के लिए एक होटल में कोरेनटाइन होना पड़ा। इस दौरान उन्हें परिवार व बच्चों को देखने तक के लिए तरसना पड़ा। 

कभी कभी उन्हें दूर से शीशे के अंदर से ही देखकर संतुष्टि कर वापस अपने ड्यूटी पर चले जाना पड़ा। उन्होंने बताया कि कोटा से आये 360 छात्रों का रैपिड जांच की गई थी जिसमें एक छात्रा पॉजिटिव आ गई इसके बाद वह काफी डरी व सहमी थी। लेकिन उन्होने उसे काफी मोटिवेट किया। बाद में रिपोर्ट नेगेटिव आई छात्रा ने घर जाते वक्त हम सभी मेडिकल स्टाफ को थैंक्यू बोला वह पल काफी सुखद रहा। डॉ स्वतंत्र सिंह ने बताया कि तीन माह पहले कोरोना के मरीज काफी कम थे तब भी लोगों का डर काफी ज्यादा था। 

वर्तमान की बात करें तो अब मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हो गया है लेकिन लोगों का डर कम हो गया है और जागरूकता अधिक आ चुकी है। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों मरीजों के भेजे जाने वाले सैंपल पर उनके नाम मिट जाने की वजह से कई सैंपल की फिर से करनी पड़ी थी। इसके बाद उन्होंने एक नई विधि का इजाद किया जिससे मरीजों का नाम अमिट हो गया और इस विधि को बीएचयू वाराणसी सहित अन्य जनपदों के लिए भी रोल मॉडल बना।

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