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भोजपुरी फिल्मों और गानों में व्याप्त अश्लीलता पर चलेगी कैंची- मनोज तिवारी

गाजीपुर न्यूज़ टीम, वाराणसी. एक जमाना था कि भोजपुरी सुगंध से पूर्वांचल ही नहीं समूचा हिंदी क्षेत्र सुगंधित था। गानों से लेकर फिल्मों तक की बड़े पैमाने पर स्वीकार्यता थी। देश ही नहीं विदेशों में भी भोजपुरी को सम्मान के नजरिये से देखा जाता था। बीच में एक ऐसा दौर आया कि फूहड़ता और अश्लीलता ने संगीत की इस विधा को दूषित कर दिया। जिससे सभ्य समाज ने इससे दूरी बना लिया। 

अब एक बार फिर भोजपुरी के फूहड़ता को खत्म करने की मुहिम कई मंचों से शुरु की गई है। यूपी बिहार की सरकारें इसके लिए कठोर प्राविधान बनाने की तैयारी में हैं। वहीं फिल्म और गानों में सेंसर बोर्ड भी कैंची चलाएगा। भोजपुरी के वर्तमान और भविष्य के स्वरूप पर भोजपुरी फिल्म अभिनेता व भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने संवाददाता से खुलकर बातचीत किया। जिसके कुछ अंश प्रस्तुत हैं।

सवाल : भोजपुरी गानों में बढ़ती अश्लीलता कैसे कम होगी। जिससे समाज के सभी तबके में इसकी स्वीकार्यता बढ़े।

जवाब : यह बहुत ही पेंचीदा सवाल है। हम इस पर बहुत चिंतित हैं। इसकी सारी जिम्मेदारी निर्माता, निदेशक, लेखक और आज के कलाकारों की है। सभी लोग जब तक इस सवाल से संजीदा नहीं होंगे तब तक इसका समाधान नहीं निकलेगा। कलाकारों को यदि लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में जगह बनाना है तो उन्हें अश्लीलता से दूर रहना होगा। हमने यूपी बिहार के सरकारों को दखल देना चाहिए। भोजपुरी सिनेमा में व्याप्त फूहड़पन को रोकने के लिए कठोर कानून बनाना चाहिए। हमने इसके लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखा है।


सवाल : फिल्मों में पहले के मुकाबले आपकी सक्रियता कम हुई है।

जवाब : निश्चित रूप से भोजपुरी फिल्म में काम करने के लिए 15 दिन का समय चाहिए होता है। सांसद बनने के बाद संगठन की ओर से दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली तब फिल्मों का त्याग करना पड़ा। हालांकि इस दौरान जब भी मौका मिला सिंगिंग को छोड़ा नहीं। कभी मां जगदंबा तो भगवान शिव तो कभी छठ के गीत गाता रहता हूं। फिलहाल दो मार्च से फिर से दर्शकों के बीच उपस्थिति हो रही है।


सवाल : राजनीति और फिल्म के बीच सामंजस्य कैसे बनाते हैं।

जवाब : हम राजनीति में भी संस्कृति के ही पक्षधर हैं। मैं साहित्य, आध्यात्म का समर्थक हूं। राजनीति में आध्यात्म बहुत आवश्यक है। लेकिन आध्यात्म में राजनीति अनावश्यक है।  संस्कृति, साहित्य में मूल चिंतन राष्ट्र का ही होना चाहिए। जो आज समय की मांग है। हमने जो 1996 में सोचा उसे आज अपनाने की आवश्यकता भी है और उसे अपनाया भी जा रहा है। हमने एक गाना गाया था रास्ता खाली कर, मंत्री जी के गाड़ी आवता। आज देखिए पीएम ने लालबत्ती को त्याग दिया। गंगा मईया के स्वच्छता पर गीत गाए तो नमामी गंगे मंत्रालय बनाया गया।


सवाल: आपकी आने वाली फिल्म कौन सी है।

जवाब: वर्ष 2021 में अपने दर्शकों को एक ऐसी फिल्म दूंगा जो हर समाज हर तबके के बीच स्वीकार्य हो सके। इसमें लगभग आठ माह का समय लगेगा। इसके लिए टीम काम कर रही है।

 
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