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कहानी: रिश्तों का दर्द

मां के हालात तो पहले से ही अच्छे नहीं, इस हादसे के बाद क्या भरोसा कितने दिन निकाल पाएं? नीलू जो आज तक अपने ही पति का विरोध न कर पाई वह दुनिया की हवसभरी निगाहों का कैसे सामना कर पाएगी? लंदन से इंडिया की ओर आने वाला विमान, विमानतल पर उतरने को तैयार था. विमान परिचारिका घोषणा कर रही थी- ‘‘कृपया, यात्रीगण अपनी पेटी बांध लें…’’ अचानक रोमी की तंद्रा भंग हुई. उस का दिल जोरों से धड़क रहा था. 

उस ने एक नजर गोद में सो रही नन्ही बेटी परी की ओर देखा… मासूम कितनी बेखबर है जिंदगी में हुए हादसों से, नहीं जानती नियति ने उस से जीवन की धूप से बचाने वाला वह छायादार दरख्त छीन लिया है. हाय, नन्ही सी मेरी बच्ची कैसे जान पाएगी पिता का साया क्या होता है. इस दुधमुंही बच्ची पर भी तरस नहीं खाया प्रकृति ने. कितनी खुशी से उस ने रणवीर के साथ अपने जीवन की शुरुआत की थी. रणवीर भी एक अच्छे और सम?ादार पति साबित हुए. उसे याद आ रहा है वह वक्त जब रणवीर के साथ उस का ब्याह तय हुआ था. कितना डर गई थी वह. एक तो रईस ठाकुरों के खानदान से… उस पर विदेश में… विदेश का न जाने कितना रंग चढ़ा होगा उन पर. 

शराब के नशे में ?ामते रणवीर का चेहरा डरा देता था उसे. आसपास मंडराती तितलियों की कल्पनामात्र से कांप जाती थी वह. राजस्थान के एक छोटे से गांव जड़ावता की रहने वाली मध्यवर्गीय परिवार की ग्रेजुएट पास रोमी कैसे निर्वाह कर पाएगी. मगर उस की खुशी का ठिकाना न रहा जब उस की वे सारी कल्पनाएं थोथी साबित हुईं. रणवीर उस की कल्पनाओं से कहीं बेहतर साबित हुए. उन्होंने न केवल ऊंची पढ़ाई हासिल की थी बल्कि उन के व्यवहार में भी वे ऊंचाइयां थीं. 

रणवीर हमेशा ध्यान रखते कि कहीं रोमी को अकेलापन महसूस न हो. लंदन जाते ही उन्होंने वहां के अच्छे भारतीय परिवारों से उस की जानपहचान करा दी थी जिन्होंने पराई जमीन पर अपनेपन का एहसास दिया रोमी को. फिर परिवार में बेटी परी का आना जश्न था उन की जिंदगी में. कितनी धूमधाम से पार्टी दी थी रणवीर ने. सभी मिलनेजुलने वालों ने ढेरों शुभकामनाओं से नवाजा था उसे. मगर किसी की मंगलकामना काम न आई. परी 10 माह की भी नहीं हुई थी कि औफिस से लौटते हुए रणवीर की कार सड़क हादसे की शिकार हो गई.

हादसा इतना भयानक था कि रोमी की जिंदगी के सारे रंग छीन ले गया और एक कभी न खत्म होने वाला इंतजार दे गया मांबेटी को. बेटा सात समंदर पार ही सही, उस की सलामती तसल्ली देती थी एक मां के दिल को. मगर इस हादसे ने ठकुराइन को जिंदा लाश बना दिया. उस की सारी ताकत मानो बेटे के साथ चली गई. वह अपनी बोलने की शक्ति खो बैठी. बस, बिस्तर पर पड़ीपड़ी आंखों से आंसू बहाती रहती. रणवीर के दोस्तों ने अंतिम संस्कार तो वहीं कर दिया. आज रोमी बाकी के कर्मकांड को संपन्न करने हेतु भारत आई है. विमान हवाई अड्डे के जैसेजैसे करीब आता जा रहा था, रोमी खुद को संभाल नहीं पा रही थी. कैसे जाएगी वह परिवार वालों के सामने. स्वयं को अपराधिनी महसूस कर रही थी वह. कभी सोलह शृंगार कर इसी हवाई अड्डे से अपना नया संसार रचने चली थी,


आज अपना सारा सुहाग उस धरती पर लुटा कर तमाम उदासियों को अपने दामन में समेटे लौट रही है. खैर, विमान अड्डे पर रुका, परिवार वाले बेसब्री से रोमी का इंतजार कर रहे थे. रोमी एक हाथ में नन्ही बेटी को संभाले, दूसरे में रणवीर का अस्थिकलश थामे विमान से बाहर उतरी. जन्मदात्री के आंसू न रुकते थे. कैसे ढाढ़स बंधाए अपनी बेटी को, शब्द और हिम्मत दोनों ही हार रहे थे. पलकों पर बैठाए रखने वाले पापा का बुरा हाल था. कैसे उन की मासूम बच्ची सात समंदर पार अकेली इतने बड़े संकट को ?ोल पाई. धिक्कार है पिता हो कर भी वे दुख की इस घड़ी में बेटी के साथ नहीं थे. हवाई अड्डे से बाहर आते ही रोमी को मांपापा दिखाई दिए. रणवीर के छोटे भाई कुंवर प्रताप ने दौड़ कर उस के हाथ से अस्थिकलश ले लिया तो रोमी के भाई ने नन्ही परी को. रोमी दौड़ कर मांपापा के सीने से लिपट गई.


आखिर इतने दिनों चट्टान बनी रोमी मातापिता के प्यार की आंच पा मोम की तरह पिघलती चली गई. आज अपनों को देख उस के दिल का सारा गुबार आंसू की धारा में बहने लगा. ‘‘मां.’’ ‘‘हाय, मेरी बच्ची. कैसे इतनी दूर, अकेली, इतना बड़ा दुख सहती रही. मेरी फूल सी बच्ची पर जरा भी रहम न किया. अरे, इस नन्ही बच्ची ने क्या बिगाड़ा था किसी का जो होते ही सिर से बाप का साया तक छीन लिया.’’ उजड़ी मांग और जिंदगी के सारे रंग खो चुकी रोमी ससुराल पहुंची तो सासुमां को निष्प्राण देख उस का जी भर आया. ठकुराइन बिस्तर पर पड़ेपड़े कभी बहू की उजड़ी मांग को देखती तो कभी नन्ही पोती को.


बस, बहते आंसू ही उस की व्यथा कह पाते और कर भी क्या सकती थी वह. अपने और परी के प्रति घर वालों का स्नेह देख रोमी को तसल्ली थी कि वह अपनी जमीन पर अपनों के बीच लौट आई. अब भला विदेश जा कर वह क्या करेगी. वहां रणवीर के संग बीते पलों के और क्या रखा है? वे यादें तो उस के जीवन का अटूट हिस्सा हैं वह कहीं भी रहे, उस के साथ रहनी ही हैं. यहां रह कर वह रणवीर के परिवार का हिस्सा बनी रहेगी. बेटी को भी स्नेह की छांव मिलेगी. ठाकुरों की ठकुराई भले ही चली गई हो मगर आज भी रणवीर का परिवार गांव का ठाकुर कहलाता है. बड़े घर के नाम से सभी सम्मान करते हैं उस परिवार का. कम से कम एक सुरक्षा का हाथ तो उस के सिर पर रहेगा, उसे और क्या चाहिए. सोचा वह लिख देगी अपने मित्रों को कि उस की प्रौपर्टी सेल कर दें.

अब वह लंदन नहीं आएगी. अपनी ओर से रोमी पूरी कोशिश करती परिवार में घुलनेमिलने की. कुंवर प्रताप के बेटे को भी परी बहुत भाती. दोनों बच्चों के अबोध प्यार को देख रोमी को सुकून था. यह रिश्ता यों ही बना रहे, आखिर यही तो चाहती है वह. नीलू भी उस का बहुत मान करती. हर बात में जीजी ऐसा, जीजी वैसा. सवा महीना होते ही रोमी के मायके से दहलीज छुड़ाने की रस्म पूरी कराने उस के पिताजी आ पहुंचे. रोमी 8 दिन मायके में रह कर फिर ससुराल लौट आई. विदेश में रह कर भी वह नहीं भूली थी कि अब ससुराल ही उस का घर है, उस की निष्ठा अब उस घर के प्रति है.


आखिर यही संस्कार तो पाए थे उस ने कि ससुराल ही लड़की का अपना घर होता है. देहरी छुड़ा कर लौटी रोमी ने महसूस किया कि घर के माहौल में कुछ परिवर्तन हुआ है. जाने क्यों अब उसे आसपास की हवा उतनी साफ नजर नहीं आ रही थी. कहीं कुछ घुटाघुटा सा लगता था. हवाओं में उल?ो जाल नजर आते, कभी लगता वह जाल उसे ही उल?ाने के लिए तैयार किया गया है तो वहीं दीवारों में कहीं कुछ दरार सी लगती, लगता कहीं कुछ है जो उस के खिलाफ पक रहा है. ठाकुर साहब अब अकसर उस के सामने आने से कतराते. उन की बातों में अब वह अपनेपन का एहसास न होता. और कुंवर प्रताप… उस से तो उस की बातें वैसे भी कम ही हो पाती थीं. एक तो शादी के 15 दिन बाद ही लंदन के लिए रवाना हो गई थी.


दूसरे, रणवीर के मुंह से सुन चुकी थी कि कुंवर प्रताप पर ठाकुरों वाला पूरा असर है. खैर, वक्त से वफादारी की उम्मीद तो वैसे भी नहीं थी. फिर भी मन को सम?ा रही थी कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. एक शाम अचानक ठाकुर साहब बोले, ‘‘बेटा नीलू, मु?ो तेरे मायके में कुछ काम है, कल तक लौट आऊंगा. चाह रहा था तू भी चल देती अपने मांबापू से मिल लेती.’’ नीलू, आखिर भोली, ठाकुरों की चाल भला क्या सम?ाती. मांबाप के स्नेह की डोर वैसे भी बड़ी रेशमी होती है. नीलू मायके का लोभ संवरण न कर सकी. ?ाट रोमी से बोली, ‘‘जीजी, सालभर हो गया मांपापा से मिले, आप कहें तो मैं हो आऊं?’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं. एक दिन की ही तो बात है, मैं मैनेज कर लूंगी.’’


हमारे पुरुषप्रधान समाज ने यों ही नारी को छली कह बदनाम कर रखा है, जबकि एक पहलू यह भी है पुरुषों की कुटिलता की थाह के लिए पानी भी उतना ही दुर्लभ है. रात रसोई के काम से निबट कर रोमी सासुमां के कमरे में परी के साथ लेटी थी कि कुंवर प्रताप के कराहने की आवाज सुनाई दी, ‘‘ओह, मर गया… मां लगता है अब नहीं बचूंगा…मेरा सिर जोरों से दर्द कर रहा है, कुछ मिल जाता लगाने को.’’ रोमी ?ाट उठ कर बाम की शीशी ले आई. ‘‘लाइए मैं लगा दूं.’’ और रोमी कुंवर प्रताप के सिर पर बाम लगा रही थी. वह कभी उस के हाथ को पकड़ कर कहता, ‘जरा जोर से… हां, हां… यहां… और जोर से. अपनत्व में पगी रोमी बेचारी कुंवर प्रताप के मन में बसे भावों को सम?ा नहीं पाई. वह तो जब कुंवर प्रताप का हाथ उस के हाथों को पार करता उस के कंधे और फिर नीचे को आने लगा तो उसे कुछ संदेह हुआ. रोमी संभलती, तब तक कुंवर प्रताप उसे अपनी गिरफ्त में ले चुका था.


रोमी बहुत चीखीचिल्लाई, कितनी गुहार लगाई, ‘मांजी बचाइए, छोड़ दो प्रताप भैया, मैं तुम्हारे भाई की अमानत हूं.’ रिश्तों की दुहाई दी, मगर उस की सारी कोशिश नाकामयाब रही. कुंवर प्रताप पर हवस का नशा चढ़ चुका था. रोमी की चीखपुकार रात के अंधेरे में कोठी की दीवारों से ही थपेड़े खा कर गुम होती जा रही थी. मांजी सुन रही थी मगर बेबस थी. आखिर ठाकुर की ऐयाशी के छींटों ने उस के दामन को दागदार कर ही दिया. रोमी ने बहुत बचने की कोशिश की. मगर कहां वह हट्टाकट्टा ठाकुर, कहां वह नाजुक सी रोमी. मुकाबला करती भी तो कैसे, कब तक? रोमी जैसेतैसे खुद को समेटे सासुमां के सीने पर जा गिरी. ‘‘मांजी, देखिए न क्या हुआ मेरे साथ. मैं यह सब सोच कर तो नहीं आई थी यहां. बताइए न मांजी, मैं कहां गलत थी? मां बोलिए न.’’ ठकुराइन आंखों से अपनी वेदना जताने के और कर भी क्या सकती थी. मन ही मन सोच रही थी कि आज तो वह बेबस है मगर तब…? जब वह बोल और चलफिर सकती थी… उस की आंखों के सामने ठाकुर ने जाने कितनी अबलाओं को अपने बिस्तर की सलवटों में रौंदा.


क्या कर पाई थी वह, कुछ भी तो नहीं. हम ठकुराइनों की हुकूमत तो बस अपने नौकरोंचाकरों तक ही रहती है. पति के आगे तो हमारा अपना कुछ भी निजत्व नहीं. आज शायद उसी खामोशी की सजा पा रही है वह. चाह कर भी अपनी बहू की अस्मत न बचा सकी. उस की पीड़ा देखिए कि वह प्यार से उस के सिर पर हाथ भी न रख सकी. रोमी कहे जा रही थी, ‘‘मां, मैं तो जमाने की बुरी नजरों से बचने के लिए आप की शरण में आई थी. मु?ो क्या पता था यहां उलटे मु?ो… यह सब… क्या हो गया मां?’’ ठकुराइन जो खुद ही एक जिंदा लाश की तरह मात्र थी, भला क्या मदद कर सकती थी उस की. रोमी रातभर रोती रही. उसे रणवीर बहुत याद आ रहा था. कहां वह नारी के प्रति सुल?ा दृष्टि रखने वाला, कहां कुंवर प्रताप… आश्चर्य, यह उसी का भाई है? सच कहा था रणवीर ने कि कुंवर प्रताप में ठाकुरों वाली बुद्धि है. मगर मु?ो ही शिकार होना था… रोमी बेसब्री से सुबह होने का इंतजार कर रही थी कि ठाकुर साहब के आते ही उन से फरियाद करेगी. वे ही दुरुस्त करेंगे इस की अक्ल. अपने स्वर्गीय बेटे की धरोहर के साथ ऐसा अनाचार. वे जरूर सजा देंगे उसे. ठाकुर के आते ही रोमी ने रोरो कर सारी व्यथा बयान कर दी.


ठाकुर ने सुनते ही कुंवर प्रताप पर दहाड़ना शुरू कर दिया. क्याक्या न कहा, सिर्फ हाथ उठाना भर रह गया था. रोमी तो डर गई थी कहीं बात खतरनाक मोड़ न अख्तियार कर ले. वे रोमी को देख बोले जा रहे थे, ‘‘बेटी, क्या करूं इस नामुराद का. अब तू ही कह, इस बुढ़ापे में एक यही तो आसरा है हमारा, घर से निकाल भी नहीं सकता उसे.’’ नारी मन भावुक होता है. फिर, बाप जैसे रिश्ते पर तो संशय का प्रश्न ही नहीं उठता. आखिर उस से पावन रिश्ता और कौन सा है. रोमी का निच्श्छल मन सोच भी नहीं पाया कि ये सब ठाकुर साहब के घडि़याली आंसू हैं. उसे कहीं से कुछ अप्रत्याशित न लगा. बल्कि वह तो डर गई कि कहीं ऐसा न हो ठाकुर साहब गुस्से में कोई कठोर कदम उठा बैठें और लोग कहें ऐसी बहू आई कि एक बेटे को खा गई चैन न आया तो दूसरे बेटे को भी छीन लिया. वह बेचारी तो उलटे खुद को नीलू का गुनहगार सम?ा रही थी. नीलू के मन में अपने लिए कोई मैल पैदा न हो, सो उस से भी अपनी सफाई पेश की. तब नीलू ने आंखों में आंसू भर इतना ही कहा, ‘‘मैं जानती हूं जीजी, आप निर्दोष हैं.’’


रोमी अवाक नीलू को देखती रही. इस घटना को तकदीर का लेखा मान भीतर ही भीतर घुल रही थी रोमी. एक ही छत के नीचे अपनी अस्मत के लुटेरे के साथ रहना कितना त्रासद था उस के लिए. वह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि क्या करे. यहां रहना उचित होगा या नहीं. असमंजस में थी. मन तो किया था उसी पल यह घर छोड़ दें मगर रणवीर के मातापिता क्या सोचेंगे. बेटा तो गया बहू भी उन्हें छोड़ गई… जो हुआ उस में भला उन का क्या दोष? अनचाही दिशा में ही सही, वक्त का दरिया अपनी गति से बह रहा था. सप्ताह भी न बीता था कि एक दिन रात में सासुमां की तबीयत ज्यादा खराब होने पर रोमी ने सोचा ठाकुर साहब को बुला लाऊं. जैसे ही वह उन के कमरे के करीब पहुंची, उसे कुछ खुसुरफुसुर की आवाजें सुनाई दीं. उस ने घड़ी देखी, रात के सवा दो बज रहे हैं.

इस वक्त. बाबूजी किस से बात कर रहे हैं. कौन हो सकता है उन के कमरे में…? कौन है इतनी रात गए. बाबूजी किस से बातें कर रहे हैं? यह सब सोच रोमी दरवाजे से ?ांकने लगी, देखा, अंदर कुंवर प्रताप और बाबूजी में बातें चल रही थीं. एक पल को रोमी ने सोचा, लौट जाए, वैसे भी कुंवर प्रताप को देखते ही उस का खून खौल जाता है. मगर जैसे ही वह जाने को हुई, उस के कानों में आवाज टकराई, ‘‘क्या करता साली, मानती ही नहीं थी. बड़ी सावित्री बन रही थी. तुम्हारे भाई की ब्याहता हूं, छोड़ दो मु?ो…’’ एक पल को रोमी पत्थर हो गई मानो कोई भारी चीज उस के सिर पर दे मारी गई है. यह तो उस के बारे में चर्चा हो रही है. शायद, बाबूजी कुंवर प्रताप को डांट रहे हैं, यह सोच उस का मन जानने को इच्छुक हुआ.


‘‘अरे नालायक, तु?ा से किस ने कहा था पहली ही बार में मांस नोंचने को. अरे, जानता नहीं, वह परदेस रह आई है, नजाकत वाली बनती है, उस के मिजाज को सम?ा कर वैसा पासा फेंकना था. पहले उसे अपनी गिरफ्त में लेता, प्यार से बहलाताफुसलाता. तू ने तो पहली बार में जवानी का जोर दिखा दिया. सारा कियाधरा गुड़गोबर कर दिया. अब कोई और उपाय खोजना होगा.’’ ‘‘अब क्या करें?’’ ‘‘अरे, तू ठाकुरों की औलाद है. एक औरत भी काबू न हो पाई तु?ा से? प्यार से, प्यार से नहीं तो धिक्कार के… सम?ा रहा है न मेरी बात. अरे, एक विधवा को काबू करने में इतना सोच रहा है. ज्यादा सोच मत, मोम को पिघलने में ज्यादा देर नहीं लगती और फिर विदेश में रही है, ज्यादा ऊंचनीच का विचार वह भी न करेगी. सोच ले, अगर निकल गई न चिडि़या हाथ से, तो फिर बस… आधी जायजाद गई, सम?ा ले. अच्छा है नाग फन फैलाए, इस से पहले उसे कुचल देना चाहिए. पड़ी रहेगी घर में रखैल बन कर.


उस की भी जरूरत है… जवान है. कहीं और मुंह मारे, इस से तो यह घर क्या बुरा है. घर का माल घर में रहेगा.’’ ‘‘तुम को लगता है बाबूजी, वह मानेगी?’’ ‘‘अरे, मानेगी… मानेगी कैसे नहीं. तू क्या उसे नीलू सम?ो हुए है कि दो हाथ जमाए कि काबू में कर लिया. अरे, चार अक्षर पढ़ी है, देर से बात सम?ा आएगी. जरा प्यार से मना, मान जाएगी. जानती है विधवा का कोई ठौर नहीं. ये पांव की जूती रणवीर ने सिर चढ़ा ली है. सो, थोड़ी परेशानी तो होगी. ‘‘और जो फिर भी न हाथ आई, चुप्पी तोड़ी तो?’’ ‘‘तो क्या, घर के पिछवाडे़ दो गज जमीन की कमी नहीं. दोनों मांबेटी के लिए. एक तो बेटी पैदा की, रणवीर का कोई नाम लेवा भी नहीं जना, सोचेंगे दो गज जमीन उसी के नाम की. ऐसे कितनों को सुकून दिया है हम ने. क्या तू नहीं जानता. चुप्पी तोड़ेगी तो सजा तो भुगतनी ही होगी.’’


‘‘फिर लोग पूछेंगे, कहां गई बहू तो? ‘‘तो क्या, कह देंगे विदेश में कोई आशिक होगा जिस के संग भाग गई. कुल को कलंक लगा गई. अरे, जिंदा रहेगी तो हमारे लिए आफत ही पैदा करेगी.’’ छि:, इतनी गंदी बात कोई ससुर अपनी बहू के लिए कैसे कह सकता है. रोमी पत्थर हो गई बाबूजी का ऐसा घिनौना रूप… जिसे वटवृक्ष सम?ा उस की छांव में आश्रय की तलाश में आई थी वही नागफनी बन उसे लहूलुहान कर गया. उस ने कभी सपने में भी न सोचा था. कोई इस हद तक गिर सकता है उसे यकीन नहीं आ रहा. ऊंची हवेली में रहने वाले ठाकुरों का घिनौना सच आज रोमी के सामने था. रोमी किसी से कहती भी तो शायद कोई यकीन न करता. खुद उसे ही यकीन करने में कितना वक्त लगा कि बाप समान ससुर एक जरा सी दौलत की खातिर अपने ही मरे बेटे की स्मृतियों के साथ घृणित षड्यंत्र खेल रहा है और वह भाई समान देवर… कहते हैं कि भाई बायां हाथ होता है.


उस को खोना जीवन की आधी उपलब्धि को खोना है. मगर यहां तो आंखों पर दौलत का ऐसा मोटा चश्मा चढ़ा है कि मातम भी जश्न दिखाई दे रहा है उन्हें. उफ, वह तो सोच कर आई थी कि रणवीर के जाने के बाद उस के परिवार वाले अपने बेटे की इस निशानी को सिरआंखों पर बिठा कर रखेंगे. पिता का साया उठ -गया तो क्या कम से कम दादादादी, चाचाचाची का हाथ तो होगा उस के सिर पर. वहां पराई जमीं पर तो वह अपने संस्कार ही भूल जाए शायद. कितनी गलत थी उस की सोच तब. यहां तो मानो इंसानियत मर गई है उन की. आज दोनों मांबेटी की जान के लाले पड़ गए हैं. उस ने तो कभी दौलत की चाह भी न की थी. वह तो बस आश्रय तलाशने आई थी. मगर नहीं जानती थी कि जिस वृक्ष की अपनी जड़ें खोखली हों वह भला दूसरों को क्या पनाह देगा. उस ने सोच लिया, अब वह यहां नहीं रहेगी. सुबह उस ने अपना सामान समेटा और परी को गोद में ले कर अचानक घोषणा कर दी कि वह मायके जा रही है. वहीं से लंदन के लिए रवाना हो जाएगी. ठाकुर और कुंवर प्रताप सकते में थे.


यह स्क्रिप्ट तो उन के खेल में कहीं से कहीं तक न थी. अचानक कैसे हो गया यह सब. दोनों बापबेटे एकदूसरे का चेहरा देख रहे थे. चिडि़या जाल से भाग जाना चाहती थी. ठाकुर की नजरें कुंवर प्रताप को घूर रही थीं, कहीं इस ने ही फिर कोई ऊंचनीच तो नहीं कर दी. वहीं कुंवर प्रताप सोच रहा था उस ने तो अभी कुछ किया ही नहीं, फिर अचानक… रोमी एक हाथ में परी को थामे, दूसरे में एक अटैची लिए बाहर को निकल पड़ी. ठाकुर पुराना खिलाड़ी था, सम?ा गया, यह चिडि़या अब हाथ न आने की, सो उस ने आखिरी चाल चली, ‘‘बहू, जब तुम ने सोच ही लिया है जाने का तो ठीक है, चलो तुम्हें मायके तक छोड़ दें.’’ रोमी के कानों में रात ठाकुर के कहे शब्द गूंज रहे थे कि हवेली के पीछे दो गज जमीन की कमी नहीं. वह एकदम चीख कर बोली, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं. मैं बस से चली जाऊंगी. आप तकलीफ न करें.’’ और उस ने एक हाथ से सूटकेस और दूसरे हाथ में परी को थाम तेजी से बाहर आ गई. ठाकुर की आंखें अंगार बरसा रही थीं. एक मामूली सी औरत उन की शह को मात दे गई. क्या करें, कैसे बात को संभाला जाए, कोई सूरत नजर न आने पर ठाकुर बोला, ‘‘अरे कुंवर प्रताप, बहू अकेले जा रही है, जानता नहीं, आजकल रास्ते में कितने हादसे होते रहते हैं. चल कम से कम उसे बस में तो बैठा आएं.


दोनों घर से बाहर आए, तब तक रोमी औटो में बैठ चुकी थी. दोनों ने तेजी से उस का पीछा किया. रोमी ने देखा कार उस का पीछा कर रही है. वह सम?ा गई कि दोनों बापबेटे किसी भी हद तक जा सकते हैं. रोमी जल्द से जल्द बस स्टैंड पहुंच जाना चाहती थी. जैसेजैसे उन की कार रोमी के औटो के करीब आती जा रही थी, उस का दिल जोरों से धड़क रहा था. वह परी को गोद में भींचे प्रकृति को याद कर रही थी. ‘‘भैया, जरा तेज चलाओ न. वह कार हमें ओवरटेक न कर पाए. भैया प्लीज, जल्दी चलिए न.’’ ‘‘कोशिश करता हूं मैडम.’’ आज ठाकुर साहब और कुंवर प्रताप सिंह रोमी को साक्षात यमदूत नजर आ रहे थे. यों मृत्यु को करीब देख उस की घबराहट बढ़ती जा रही थी. ड्राइवर ने औटो की रफ्तार तेज की ही थी कि सामने एक बड़ा सा ट्रक आ गया, ची..चर्र.. की आवाज के साथ एक जोरदार ब्रेक लगाते हुए ड्राइवर ने औटो को टर्न किया. औटो ट्रक के दूसरी ओर जा पड़ा और तेज रफ्तार से औटो का पीछा करती ठाकुर की कार ट्रक में जा घुसी. प्रकृति का न्याय सामने था, उसे शायद आज दया आ गई बेबस मांबेटी पर. उन की जान लेने चले दोनों नरभक्षी स्वयं मौत के मुंह में चले गए थे. रोमी ने चैन की सांस ली. मगर परिवार के लिए दूसरा बड़ा हादसा था. दो माह के भीतर घर के तीनों मर्द चले गए.


गांव में गहरे शोक की लहर दौड़ गई. कोठी में गांव वालों की भीड़ जमा हो गई. लोग अफसोस कर रहे थे कि ‘‘इस घर को देखो, कोई मर्द नहीं. तीनतीन विधवाएं, मानो तीनों अभिशापित हों. कैसे संभालेंगीं खुद को?’’ पुरुष चाहे कितना ही निकम्मा क्यों न हो, समाज की आंखों में वही स्त्री का रक्षक होता है मगर कैसे सम?ाए रोमी उस समाज को कि यहां तो रक्षक ही भक्षक बने हुए थे. हम अपने ही घर में खुद को महफूज नहीं पा रही थीं. सभी इस हादसे के लिए प्रकृति को दोषी ठहरा रहे थे. रोमी, जो इस हादसे की चश्मदीद गवाह थी, जानती थी कि यह हादसा नहीं, न ही प्रकृति इस के लिए दोषी है. रोमी ही क्यों, घर की अन्य महिलाएं भी हादसे के पीछे छिपे कारण से भलीभांति परिचित थीं. आखिर वे भी बरसों से इस नर्क को ?ोल रही थीं. मगर घर की बिखरती लाज के डर से होंठों को सी लिया था, खामोश थीं क्योंकि जानती थीं कि ठाकुर या फिर कुंवर प्रताप उन्हें छोड़ेंगे नहीं.

पुरुष प्रधान समाज ने नारी को अबला ही नहीं बल्कि अपनी साधिकार कामना पूर्ति का साधन माना है. दोनों का अंतिम संस्कार हो चुका था. आज कोठी में एक भयानक सा सन्नाटा था, जैसे एक तूफान आया और अपने साथ सब का चैन व सुकून लूट कर ले गया. रात कमरे में बैठी रोमी अपने लंदन के मित्रों को पत्र लिख रही थी कि वह अपनी प्रौपर्टी सेल करना चाहती है, अब उसे यहीं रहना है, इंडिया में. इस हादसे ने उसे न चाहते हुए भी विवश कर दिया है यहां रहने के लिए. मां के हालात तो पहले से ही अच्छे नहीं, इस हादसे के बाद क्या भरोसा कितने दिन निकाल पाएं? बची नीलू, जो आज तक अपने ही पति का विरोध न कर पाई. वह दुनिया की हवसभरी निगाहों का कैसे सामना कर पाएगी? रणवीर नहीं हैं तो उन की जगह अब उसे ही यह जिम्मेदारी निभानी है. नीलू और उस के बेटे की जिम्मेदारी आखिर उस की ही तो है. वह नहीं चाहती कि जिस दर्द से वह गुजरी है उस से नीलू भी गुजरे. आखिर, दर्द का ही सही, रिश्ता तो है उस का इस घर से. 

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