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कहानी: मिस्टर डरपोक

रोहन अंदर से टूट चुका था। रविवार का दिन आ गया। वह एक मशीन की तरह तैयार हुआ और अपने माता-पिता के साथ शर्मा जी के घर पहुँच गया। घर बहुत सुंदर सजा था। शर्मा जी और दीनानाथ जी आपस में ऐसे गले मिल रहे थे जैसे बरसों के बिछड़े भाई हों। थोड़ी देर बाद रस्मों के अनुसार शर्मा जी ने कहा, "बच्चों को आपस में बात कर लेनी चाहिए। रोहन बेटा, तुम छत वाले कमरे में चले जाओ, बेटी वहीं है।"
रोहन एक बेहद साधारण और संस्कारी परिवार का लड़का था। उसके पिता, दीनानाथ जी, शहर के जाने-माने और सख्त उसूलों वाले इंसान थे। रोहन ने बचपन से लेकर आज तक अपने पिता की हर बात को पत्थर की लकीर माना था। उनके सामने अपनी कोई इच्छा जाहिर करना रोहन के लिए किसी पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था। लेकिन रोहन की इसी शांत और ठहरी हुई जिंदगी में एक दिन नीतिका नाम की एक ठंडी हवा का झोंका आया। नीतिका से उसकी मुलाकात शहर की एक लाइब्रेरी में हुई थी। दोनों की पसंद एक जैसी थी, दोनों को पुरानी किताबें और खामोशियाँ पसंद थीं। धीरे-धीरे यह जान-पहचान एक गहरे और पवित्र प्रेम में बदल गई।
नीतिका एक बहुत ही सुलझी हुई और समझदार लड़की थी। वह जानती थी कि रोहन अपने पिता से कितना डरता है और उनका कितना सम्मान करता है। रोहन ने कई बार हिम्मत जुटानी चाही कि वह अपने पिता को नीतिका के बारे में बताए, लेकिन जब भी वह उनके सामने जाता, उसके होंठ सिल जाते। 
दिन बीतते गए और एक दिन दीनानाथ जी ने रोहन को अपने कमरे में बुलाकर एक ऐसा फरमान सुनाया जिसने रोहन के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। 
"रोहन, मेरे एक पुराने मित्र हैं, शर्मा जी। मैंने उनकी बेटी के साथ तुम्हारा रिश्ता तय कर दिया है। अगले रविवार हम उन्हें देखने जा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि तुम मेरे फैसले का मान रखोगे," दीनानाथ जी की आवाज़ में एक ऐसा रुतबा था जिसमें कोई गुंजाइश नहीं थी।
रोहन का गला सूख गया। वह बस सिर झुकाकर कमरे से बाहर आ गया। उस रात वह बहुत रोया। उसने नीतिका को फोन किया और फूट-फूट कर रोते हुए अपनी बेबसी जाहिर की। नीतिका फोन के उस पार खामोश रही। उसने बस इतना कहा, "रोहन, अगर तुम्हारे प्यार में इतनी भी हिम्मत नहीं है कि तुम अपने पिता के सामने सच बोल सको, तो शायद हमारा सफर यहीं तक था।" नीतिका ने फोन काट दिया और उसके बाद रोहन का कोई फोन नहीं उठाया।
रोहन अंदर से टूट चुका था। रविवार का दिन आ गया। वह एक मशीन की तरह तैयार हुआ और अपने माता-पिता के साथ शर्मा जी के घर पहुँच गया। घर बहुत सुंदर सजा था। शर्मा जी और दीनानाथ जी आपस में ऐसे गले मिल रहे थे जैसे बरसों के बिछड़े भाई हों। थोड़ी देर बाद रस्मों के अनुसार शर्मा जी ने कहा, "बच्चों को आपस में बात कर लेनी चाहिए। रोहन बेटा, तुम छत वाले कमरे में चले जाओ, बेटी वहीं है।"
रोहन भारी कदमों से सीढ़ियां चढ़ने लगा। उसका हर एक कदम उसे भारी लग रहा था। वह मन ही मन एक फैसला कर चुका था। वह अपने पिता की इज्जत सबके सामने नीलाम नहीं कर सकता था, लेकिन वह नीतिका के अलावा किसी और को अपनी जिंदगी में जगह भी नहीं दे सकता था। 
रोहन ने कमरे का दरवाजा खोला। अंदर एक सोफे पर वह लड़की बैठी थी। उसने भारी सी साड़ी पहन रखी थी और उसका चेहरा दूसरी तरफ मुड़ा हुआ था। रोहन ने दरवाजा बंद किया, लेकिन वह उस लड़की के करीब नहीं गया। वह दरवाजे के पास ही खड़ा रहा। उसने अपनी नज़रें फर्श पर गड़ाए रखीं। 
"देखिए," रोहन ने बिना लड़की की तरफ देखे एक रुंधे हुए लेकिन दृढ़ स्वर में कहना शुरू किया, "मैं जानता हूँ कि यह तरीका बहुत गलत है और मैं इसके लिए आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगता हूँ। मैं आपको किसी भी झूठे भ्रम या उम्मीद में नहीं रखना चाहता। मेरे पिता मेरे लिए भगवान हैं और मैं भरी महफिल में उन्हें मना करके उनका सिर नीचे नहीं झुका सकता था। लेकिन सच यह है कि मैं किसी और से बेइंतहा प्यार करता हूँ। मेरी जिंदगी के हर पन्ने पर सिर्फ उसी का नाम लिखा है और मैं मरते दम तक उस नाम को मिटा नहीं सकता।"
कमरे में एकदम सन्नाटा था। रोहन की आँखों से आँसू छलक कर गालों पर आ गिरे थे। उसने गहरी सांस ली और आगे कहा, "मैं आपके साथ शादी करके आपकी जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता। आप एक बहुत अच्छी लड़की होंगी, लेकिन मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है... मेरा दिल पहले ही किसी और का हो चुका है। मेरी आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि आप नीचे जाकर अपने माता-पिता से कह दीजिए कि आपको यह लड़का पसंद नहीं आया। आप मुझमें कोई भी कमी निकाल दीजिए, मैं सब सह लूंगा। कम से कम मेरे पिता का मान रह जाएगा कि इंकार उधर से हुआ है। प्लीज, मेरे लिए और अपने भविष्य के लिए इस रिश्ते को 'ना' कह दीजिए।"
रोहन ने अपनी बात खत्म की और अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं। वह अपनी धड़कनों की आवाज़ साफ सुन सकता था। 
"क्या सच में 'ना' कह दूँ?" 
एक बेहद कोमल और जानी-पहचानी आवाज़ रोहन के कानों से टकराई। वह आवाज़ सुनते ही रोहन के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उसने झटके से अपनी आंखें खोलीं और सामने सोफे की तरफ देखा।
वह लड़की अब उसकी तरफ मुड़ चुकी थी। चेहरे पर एक शरारती लेकिन प्यार भरी मुस्कान थी और आँखों में भी नमी थी। वह कोई और नहीं, बल्कि नीतिका थी।
"तुम...?" रोहन की आवाज़ जैसे गले में ही फंस गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। "नीतिका... तुम यहाँ?"
"हाँ मैं, कोई शक?" नीतिका अपनी जगह से उठी और रोहन के करीब आ गई। उसकी मुस्कान और भी गहरी हो गई थी।
"पर... पर यह सब क्या है नीतिका? शर्मा जी की बेटी... मेरे पिता... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है," रोहन अभी भी किसी गहरे सदमे में लग रहा था।
नीतिका ने रोहन के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बहुत ही भावुक होकर बोली, "रोहन, तुम्हारे पिता और मेरे पिता कॉलेज के समय के सबसे अच्छे दोस्त हैं। जब मैंने अपने घर पर तुम्हारे बारे में बताया, तो पापा ने तुरंत तुम्हारे पिता से बात की। तुम्हारे पिता जी यह जानकर बहुत खुश हुए थे। लेकिन..."
नीतिका थोड़ी देर रुकी और रोहन की आँखों में झांकते हुए बोली, "लेकिन मैं देखना चाहती थी कि जो इंसान अपने पिता के डर से कभी उफ़ तक नहीं करता, क्या उसके अंदर मेरे लिए इतनी हिम्मत है कि वह किसी अजनबी के सामने भी मेरे प्यार को स्वीकार कर सके? क्या वह मेरे लिए किसी दबाव के आगे झुकने से इंकार कर सकता है? तुम्हारे पिता ने भी मेरा साथ दिया। वे भी देखना चाहते थे कि उनका आज्ञाकारी बेटा अपने दिल की बात कब और कैसे कहता है।"
रोहन को अब पूरी बात समझ में आ रही थी। दीनानाथ जी की सख्ती, नीतिका की वो नाराज़गी, सब कुछ एक नाटक था। एक ऐसा नाटक जिसने आज रोहन को उसके डर से आज़ाद कर दिया था। 
"तुम पागल हो नीतिका! मेरी तो जैसे जान ही निकल गई थी," रोहन ने अपनी छलकती आँखों के साथ मुस्कुराते हुए कहा। 
"सजा तो तुम्हें मिलनी ही थी, मिस्टर डरपोक," नीतिका ने हंसते हुए कहा। 
तभी कमरे का दरवाजा खुला और दीनानाथ जी शर्मा जी के साथ अंदर मुस्कुराते हुए दाखिल हुए। दीनानाथ जी ने आगे बढ़कर रोहन के कंधे पर हाथ रखा। "बेटा, आज्ञाकारी होना अच्छी बात है, लेकिन जो इंसान अपने प्यार और अपने हक़ के लिए खड़ा नहीं हो सकता, वह जीवन की जिम्मेदारियां कैसे उठाएगा? मुझे तुम पर गर्व है कि तुमने बेईमानी का रिश्ता जोड़ने के बजाय सच बोलने की हिम्मत दिखाई।"
रोहन ने अपने पिता के पैर छुए और फिर नीतिका की तरफ देखा। आज वह सिर्फ एक आज्ञाकारी बेटा ही नहीं, बल्कि एक सच्चा और हिम्मतवाला प्रेमी भी बन गया था। उस बंद कमरे में हुई उस अजीब सी बातचीत ने उनके जीवन के सारे फासले हमेशा के लिए मिटा दिए थे।