कहानी: मैं गर्भवती हूँ
जिस दिन मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूँ, उसी दिन उसकी माँ दो करोड़ रुपये लेकर मेरे पास आईं और मुझसे अपने बेटे से दूर चले जाने को कहा। मैंने वह पैसा ले लिया और बिना कुछ कहे चली गई। लेकिन जिस दिन मेरी डिलीवरी होने वाली थी, उस दिन मैं सन्न रह गई जब एक काग़ज़ मेरे पास भेजा गया…
मुझे वह नियति का दिन आज भी साफ़-साफ़ याद है। सुबह-सुबह प्रेग्नेंसी टेस्ट पर दो गहरी लाल लकीरें उभर आईं और मेरा दिल जैसे एक पल को रुक गया। खुशी, डर, घबराहट—सब कुछ एक साथ उमड़ पड़ा। मैं अभी अपने प्रेमी अर्जुन को यह खुशखबरी बताने ही वाली थी कि दरवाज़े की घंटी बज उठी। दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी माँ, श्रीमती शर्मा खड़ी थीं—ठंडी नज़रें और हाथ में चमकता हुआ काला ब्रीफ़केस।
उन्होंने एक पल भी भूमिका नहीं बाँधी। “यह दो करोड़ रुपये हैं,” उन्होंने सपाट लेकिन चाकू-सी धारदार आवाज़ में कहा, “इन्हें लो और मेरे बेटे की ज़िंदगी से हमेशा के लिए चली जाओ।” उन्होंने ब्रीफ़केस मेज़ पर रखा, ढक्कन खोला—अंदर नोटों की गड्डियाँ करीने से सजी हुई थीं। मैं हक्का-बक्का रह गई। अर्जुन और मैं तीन साल से साथ थे, हर मुश्किल का सामना किया था, लेकिन उसके घरवाले शुरू से ही मेरे ख़िलाफ़ थे—क्योंकि मैं एक छोटे शहर की साधारण लड़की थी, हैसियत का मेल नहीं था। मैंने समझाने की कोशिश की, मगर श्रीमती शर्मा ने बात काट दी—“तुम उसके लायक़ नहीं हो। मुझे मजबूर मत करो कि मैं इससे कड़े क़दम उठाऊँ।”
मैंने वह ब्रीफ़केस उठाया, एक शब्द भी नहीं कहा, और वहाँ से चली गई। न अर्जुन से मिली, न कोई चिट्ठी छोड़ी—बस चुपचाप उसकी दुनिया से ग़ायब हो गई।
मैं एक छोटे से शहर में जा बसी, जहाँ मुझे कोई नहीं जानता था। दो करोड़ रुपये नए सिरे से शुरुआत करने के लिए काफ़ी थे—एक छोटा-सा फ़्लैट किराए पर लिया, ज़रूरी सामान खरीदा, और दिन किसी तरह गुजरने लगे।
डिलीवरी का दिन अचानक आ गया। दर्द की तीखी लहरों ने मुझे सड़क पर ही लगभग बेहोश कर दिया, जब मैं अस्पताल की ओर भाग रही थी। मुझे बस इतना याद है कि किसी नर्स की आवाज़ कानों में पड़ी—किसी “काग़ज़” की बात हो रही थी—और फिर मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया…
…और फिर मुझे होश आया।
सफ़ेद रोशनी मेरी आँखों में चुभ रही थी। शरीर बर्फ़ की तरह ठंडा और भारी लग रहा था। कानों में मशीनों की धीमी-सी बीप गूँज रही थी। कुछ सेकंड तक मैं यह समझ ही नहीं पाई कि मैं ज़िंदा हूँ या मर चुकी हूँ।
“माँ…?”
एक बेहद धीमी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
मैंने गर्दन मोड़ने की कोशिश की। पास ही एक नर्स खड़ी थी, और उसके पीछे काँच की दीवार के उस पार—एक छोटा-सा नन्हा शरीर, इनक्यूबेटर में।
“बधाई हो,” नर्स ने कहा, “आपको बेटा हुआ है।”
मेरी आँखों से अपने-आप आँसू बह निकले। दर्द, डर, अकेलापन—सब कुछ उस एक वाक्य में पिघल गया।
मेरा बच्चा… मेरा अर्जुन… नहीं—अब वह सिर्फ़ मेरा था।
लेकिन तभी वह बात मुझे याद आई।
“नर्स… आपने पहले किसी काग़ज़ की बात की थी…”
मेरी आवाज़ काँप रही थी।
नर्स एक पल के लिए रुकी, फिर उसने ड्रॉअर से एक लिफ़ाफ़ा निकाला।
“ये डिलीवरी से ठीक पहले आया था। आपके नाम।”
लिफ़ाफ़े पर मेरा नाम साफ़-साफ़ लिखा था—पर लिखावट मेरी नहीं थी।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
मैंने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर सिर्फ़ एक पन्ना था।
“अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो इसका मतलब है कि तुम ज़िंदा हो।
और अगर ज़िंदा हो, तो अब सच्चाई जानने का वक़्त आ गया है।
— अर्जुन”
मेरी साँस अटक गई।
“अर्जुन…?”
वह कैसे जानता था?
मैंने तो उसे कभी बताया ही नहीं…
काग़ज़ मेरे हाथों में काँप रहा था।
अगले दिन, जब मैं थोड़ा सँभल चुकी थी, अस्पताल के कमरे में अचानक हलचल हुई।
दरवाज़ा खुला—और अंदर जो चेहरा दिखा, उसे देखकर मेरी दुनिया हिल गई।
वह थी… श्रीमती शर्मा।
वही ठंडी आँखें। वही सख़्त चेहरा।
लेकिन इस बार… वह अकेली नहीं थीं।
उनके पीछे अर्जुन खड़ा था।
मेरे दिल की धड़कन रुक गई।
मैंने अविश्वास से उसकी ओर देखा।
वह पतला हो गया था, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे, और चेहरे पर ऐसा दर्द… जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
“तुम…?”
मेरे मुँह से बस यही निकल पाया।
अर्जुन आगे बढ़ा।
“मुझे माफ़ कर दो,” उसकी आवाज़ टूट रही थी।
मैंने नर्स की ओर देखा। वह चुपचाप बाहर चली गई।
कमरे में अब सिर्फ़ हम तीन थे।
“तुम्हें कैसे पता चला?” मैंने काँपते हुए पूछा।
अर्जुन ने माँ की ओर देखा।
“क्योंकि उसने सब कुछ बता दिया।”
श्रीमती शर्मा ने गहरी साँस ली।
“मुझे नहीं पता था कि वह बच्चा तुम्हारा है… जब तक कि बहुत देर नहीं हो गई।”
मेरे भीतर आग-सी जल उठी।
“बहुत देर?”
“किसके लिए बहुत देर?”
“मेरे लिए? या आपके बेटे के लिए?”
अर्जुन ने अचानक मेरे सामने घुटनों के बल बैठते हुए कहा,
“मेरे लिए।”
मेरी आँखों से आँसू बह निकले।
“तुम जानते हो,” उसने कहा, “जब तुम चली गईं… मैं टूट गया। मैंने हर जगह तुम्हें ढूँढा। माँ ने कहा था तुम किसी और के साथ चली गई हो। मैंने यक़ीन नहीं किया।”
“फिर एक दिन…”
उसने जेब से एक पुराना बैंक स्टेटमेंट निकाला।
“दो करोड़ रुपये एक ही दिन में निकाले गए थे।”
मैं चौंक गई।
“माँ,” उसने धीरे-से कहा, “उस दिन आपने क्या किया था?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
श्रीमती शर्मा की आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।
“मैंने सोचा था…”
उनकी आवाज़ भारी थी।
“मैं अपने बेटे का भविष्य बचा रही हूँ।”
“लेकिन आपने मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी!”
मैं चीख पड़ी।
उन्होंने सिर झुका लिया।
“और आज…”
उन्होंने इनक्यूबेटर की ओर देखा।
“आज मुझे समझ आया कि पैसा सब कुछ नहीं होता।”
अर्जुन खड़ा हुआ।
“वह मेरा बेटा है।”
मैंने धीरे-से कहा,
“नहीं। वह मेरा बेटा है।
और रहेगा।”
अर्जुन ने मेरी आँखों में देखा।
“अगर तुम इजाज़त दो…”
मैं चुप रही।
उस रात मैं सो नहीं पाई।
मेरे दिमाग़ में सवालों की आँधी थी।
क्या मैं उसे फिर से भरोसा कर सकती हूँ?
क्या मैं उस औरत को माफ़ कर सकती हूँ, जिसने मुझे खरीदा?
सुबह-सुबह दरवाज़ा फिर खुला।
इस बार सिर्फ़ श्रीमती शर्मा थीं।
उन्होंने मेरे सामने एक और काग़ज़ रखा।
“यह क्या है?” मैंने सख़्ती से पूछा।
“मेरी वसीयत,” उन्होंने कहा।
“मैंने अपनी सारी संपत्ति—अपने बेटे के नाम से हटाकर—अपने पोते के नाम कर दी है।”
मैं सन्न रह गई।
“आप यह क्या कर रही हैं?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“प्रायश्चित।”
“लेकिन मैं आपका पैसा नहीं चाहती।”
“मैं जानती हूँ,” उन्होंने कहा।
“इसलिए यह शर्त है—सिर्फ़ एक।”
मैंने आँखें उठाईं।
“मुझे अपने पोते की दादी बनने दो।
नहीं माँ बनूँगी, नहीं फ़ैसले करूँगी।
बस… पास रहने दो।”
मेरे भीतर कुछ टूट गया।
मैंने पहली बार उन्हें एक माँ के रूप में देखा—डरी हुई, पछताई हुई।
तीन महीने बाद…
मैं अपने बच्चे को गोद में लिए बालकनी में खड़ी थी।
अर्जुन मेरे बगल में था।
“हम धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे,” उसने कहा।
“बिना दबाव के।”
मैंने सिर हिलाया।
श्रीमती शर्मा दूर से हमें देख रही थीं—कुछ नहीं कहतीं, कुछ माँगती नहीं।
समय बीता।
पैसा, बदला, घमंड—सब पीछे छूट गया।
एक दिन अर्जुन ने कहा,
“अगर तुम चाहो… तो हम शादी कर सकते हैं।
अगर नहीं… तो मैं समझूँगा।”
मैंने अपने बेटे की ओर देखा।
फिर उसकी ओर।
“मैं शादी किसी दबाव में नहीं करूँगी,” मैंने कहा।
“लेकिन इस बार… मैं भागूँगी नहीं।”
शादी सादगी से हुई।
कोई तड़क-भड़क नहीं।
कोई दिखावा नहीं।
बस सच्चाई, पछतावा और प्यार।
श्रीमती शर्मा ने मेरे पैर छुए।
“मुझे माफ़ कर दो,” उन्होंने कहा।
मैंने उन्हें उठाया।
“माफी तब पूरी होती है, जब गलती दोहराई न जाए।”
उन्होंने सिर हिलाया।
आज मेरा बेटा पाँच साल का है।
वह जानता है कि उसकी माँ ने कभी पैसे के आगे अपना आत्मसम्मान नहीं बेचा—
और उसके पिता ने सच्चाई के लिए अपनी माँ से भी टकराने की हिम्मत की।
और मैंने सीखा—
कि कभी-कभी चुपचाप चले जाना हार नहीं होता…
बल्कि वह तूफ़ान से पहले की शांति होती है।
और जो रिश्ता सच में अपना होता है—
वह देर से ही सही,
लौटकर ज़रूर आता है।
