कहानी: करुणा
बहू ससुराल में 10 बजे तक सोती रही, सास ने छड़ी उठाई मारने के लिए, पर बिस्तर पर मंज़र देखकर दंग रह गई…
शादी की रस्में पूरी होने के बाद, श्रीमती शर्मा ने घर की सफाई की और थककर चूर हो गईं और सो गईं, जबकि उनका बेटा अमित और बहू प्रिया भी काफी देर पहले अपने कमरे में जा चुके थे। लेकिन अगली सुबह वह 5 बजे उठ गईं और फिर से सफाई करने लगीं क्योंकि घर धूल और तेल से सना हुआ था। लेकिन 10 बज गए, उनकी कमर झुक गई थी, फिर भी ऊपर से कोई हलचल नहीं हुई।
तभी, उन्होंने नीचे से आवाज़ लगाई: “बहू ओ बहू, नीचे आओ और खाना बनाओ। बहू ओ बहू।” काफी देर तक कोई जवाब नहीं आया, तो उन्होंने फिर आवाज़ लगाई: “बहू, उठो।”
चूँकि उनके पैरों में दर्द था, वह सीढ़ियाँ बार-बार चढ़ना-उतरना नहीं चाहती थीं, इसलिए वह नीचे खड़ी होकर धीरे-धीरे आवाज़ लगाती रहीं, लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं मिला। वह थक भी गई थीं और गुस्सा भी आ रहा था, इसलिए उन्होंने रसोई के कोने में रखी एक छड़ी उठाई और बहू को सबक सिखाने के लिए ऊपर गईं।
जैसे ही वह ऊपर पहुँचीं, वह हाँफ रही थीं: “यह कैसी बहू है, नई-नई शादी हुई है और कोई शिष्टाचार नहीं जानती, भरी दोपहर तक बिस्तर पर पड़ी है। उठो।” इतना कहकर उन्होंने कंबल हटा दिया, लेकिन बिस्तर की चादर पर खून देखकर वह हैरान रह गईं…
जैसे ही श्रीमती शर्मा ने कंबल हटाया, उनकी आँखें चादर पर फैले गहरे लाल धब्बों पर टिक गईं। एक पल के लिए उनके हाथ से छड़ी छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। “ये… ये खून?” उनकी आवाज़ काँप गई। उसी पल उनकी नज़र बिस्तर के कोने में सिकुड़ी हुई प्रिया पर पड़ी, जो अचेत-सी हालत में पड़ी थी, उसका चेहरा पीला, होंठ सूखे और साँस बेहद हल्की। श्रीमती शर्मा चीख पड़ीं, “अमित! अमित!” और बिना अपनी कमर के दर्द की परवाह किए वे दौड़कर बाहर निकलीं। अमित घबराया हुआ कमरे में आया तो माँ ने काँपते हाथों से बिस्तर की ओर इशारा किया, “ये क्या हो गया है तुम्हारी पत्नी को?” अमित ने जैसे ही प्रिया को देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया। वह घुटनों के बल बैठ गया, “प्रिया… प्रिया, आँखें खोलो,” लेकिन कोई जवाब नहीं। तभी प्रिया की हल्की-सी कराह सुनाई दी। वह बुदबुदाई, “माँ… मुझे बहुत दर्द हो रहा है।”
अमित ने उसे सहारा देकर उठाने की कोशिश की तो देखा कि उसके पैरों और कमर के पास खून बह चुका था। श्रीमती शर्मा के भीतर का गुस्सा पलभर में डर और पछतावे में बदल गया। “बेटा, एम्बुलेंस बुलाओ,” उन्होंने रोते हुए कहा। अमित ने फोन मिलाया, हाथ काँप रहे थे। एम्बुलेंस के आने तक वे दोनों प्रिया के पास बैठे रहे। श्रीमती शर्मा बार-बार कह रही थीं, “मैंने सोचा ये आलसी है… मुझे क्या पता था…” उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
अस्पताल पहुँचते-पहुँचते प्रिया बेहोश हो गई। डॉक्टरों ने तुरंत उसे अंदर ले जाया। कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए, उनके चेहरे पर गंभीरता थी। “आपकी बहू को अंदरूनी रक्तस्राव हुआ है। ये रात में ही शुरू हो गया था। अगर थोड़ी और देर हो जाती तो…” डॉक्टर ने बात अधूरी छोड़ दी। श्रीमती शर्मा की टाँगें जवाब दे गईं। वे कुर्सी पर बैठ गईं और सिर पकड़ लिया। “ये सब मेरी वजह से हुआ,” वे सिसक पड़ीं। अमित ने माँ का हाथ पकड़ा, “नहीं माँ, आप खुद को दोष मत दीजिए।”
घंटों बाद प्रिया को होश आया। श्रीमती शर्मा सबसे पहले उसके पास पहुँचीं। उन्होंने काँपते हाथों से प्रिया का माथा छुआ, “बेटी, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें गलत समझा।” प्रिया ने कमज़ोर-सी मुस्कान दी। “माँ, मैं सो नहीं रही थी… रात से ही दर्द था। मैंने अमित को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत थका हुआ था।” यह सुनकर अमित की आँखें भर आईं। “प्रिया, तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?” प्रिया की आँखों से आँसू बहने लगे, “मैं नहीं चाहती थी कि शादी के तुरंत बाद सब परेशान हों।”
डॉक्टरों ने बताया कि प्रिया को पहले से एक स्वास्थ्य समस्या थी, जिसे उसने कभी किसी को नहीं बताया। शादी और थकान की वजह से वह गंभीर हो गई। श्रीमती शर्मा ने उसी पल मन ही मन ठान लिया कि अब वह कभी किसी को बिना जाने-समझे जज नहीं करेंगी। अस्पताल में कई दिन बीते। श्रीमती शर्मा हर समय प्रिया के पास रहीं, उसे अपने हाथों से खाना खिलाया, दवाइयाँ दीं और रात-रात भर जागती रहीं। पड़ोस और रिश्तेदार भी आने लगे। सबके सामने श्रीमती शर्मा ने कहा, “मैंने अपनी बहू को बेटी समझने में देर कर दी, लेकिन अब ये मेरी बेटी है।”
धीरे-धीरे प्रिया ठीक होने लगी। घर लौटने पर माहौल बदला हुआ था। श्रीमती शर्मा ने घर के कामों के लिए मदद रख ली और प्रिया को आराम करने दिया। एक दिन प्रिया ने माँ-सास का हाथ पकड़कर कहा, “माँ, अब मैं पूरी तरह ठीक हूँ।” श्रीमती शर्मा की आँखों में चमक आ गई, “नहीं बेटी, अभी भी आराम ज़रूरी है।” अमित ने मुस्कुराते हुए दोनों को देखा और कहा, “हमारा घर अब सच में खुशियों से भरा है।”
कुछ महीनों बाद डॉक्टर ने खुशखबरी दी कि प्रिया पूरी तरह स्वस्थ है और जल्दी ही वह माँ बनने वाली है। यह सुनकर श्रीमती शर्मा खुशी से रो पड़ीं। उन्होंने प्रिया को गले लगाकर कहा, “जिस दिन मैंने तुम्हें गलत समझा, वही मेरी सबसे बड़ी भूल थी, लेकिन उसी ने मुझे सबसे बड़ा सबक सिखाया।”
समय बीतता गया। घर में बच्चे की किलकारी गूँज उठी। श्रीमती शर्मा बच्चे को गोद में लेकर अक्सर सोचतीं कि अगर उस दिन गुस्से में उन्होंने सच जाने बिना फैसला कर लिया होता, तो आज यह खुशी शायद कभी न मिलती। उन्होंने सबके सामने कहा, “घर तभी घर बनता है जब समझ, धैर्य और प्यार हो। जल्दबाज़ी में किया गया एक गलत कदम ज़िंदगी भर का पछतावा बन सकता है।”
और उसी दिन से उस घर में एक नई परंपरा शुरू हुई—किसी को भी कभी बिना पूछे, बिना सुने दोषी नहीं ठहराया जाएगा। यही उस कहानी का सबसे बड़ा और अनमोल अंत था, जिसने सबको यह सिखाया कि असली संस्कार डाँट-डपट में नहीं, बल्कि समझ और करुणा में होते हैं।
