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गाजीपुर: गहमर गांव के हर घर की परंपरा बन चुका है फौजी बनना, इस विरासत को बखूबी संभाल रहे युवा

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गाजीपुर गहमर गांव के हर घर में देश भक्ति का जज्बा और हर युवा के दिल में सैनिक बन कर देश सेवा की हसरत। शायद यही वजह है कि इस गांव को फौजियों का गांव कहते है। गाजीपुर का गहमर गांव जहां कई पीढ़ियों से देश सेवा के लिए फौजी बनना एक परम्परा बन चुकी है। गहमर का हर युवा आज भी फौजियों के गांव की इस परम्परा की विरासत पूरे जिम्मेदारी से संभाले हुये है। गाजीपुर में फौजियों का ये गांव जहां एशिया में सबसे बड़ा गांव है,वहीं औसतन हर घर में एक सैनिक इस गांव की शान बढ़ा रहा है। हर करम अपना करेंगें ऐ वतन तेरे लिए। दिल दिया है जान भी देंगें ऐ वतन तेरे लिए। गाजीपुर के गहमर गांव की फिजाओं में शायद यही लफ्ज हर पल गूंजते है। गहमर की मिट्टी,हवा और पानी भी देश भक्ति और देश सेवा के जज्बे को पूरी तरह अपने में समेटे हुये है।


यहीं वजह है कि गांव के हर शख्स के लिए फौजी बनकर देश सेवा पहला लक्ष्य होता है।गांव की गलियां हो,बाग,खेत खलिहान या गंगा के घाट हर जगह युवा फौज में भर्त्ती के लिए जी तोड़ मेहनत करते नजर आते है।गदहमर के हर युवा के दिल में फौज में भर्त्ती होकर देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने का हौंसला उन्हे बेमिसाल बनाता है। गाजीपुर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर गंगा किनारे बसा गहमर एशिया का सबसे बड़ा गांव माना जाता है।जिसकी कुल आबादी एक लाख बीस हजार है।तकरीबन 25हजार मतदाताओं वाला गहमर 8 वर्ग मील में फैला हुआ है। 

गहमर 22 पट्टियों या टोले में बंटा है। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते है कि सन 1530 में कुसुम देव राव ने सकरा डीह नामक स्थान पर गहमर गांव बसाया था।गहमर में ही प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर भी है। जो पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत बिहार के लोगों के लिए आस्था का बड़ा केन्द्र है। लेकिन गहमर की सबसे बड़ी पहचान है कि गहमर के हर घर में एक फौजी है। गांव वाले मां कामाख्या को अपनी कुल देवी मानते है। और देश सेवा अपना सबसे बड़ा फर्ज । गहमर गांव के औसतन हर घर से एक पुरुष सेना में कार्यरत है। गांव के हर घर में फौजियों की तस्वीरे,वर्दियां और सेना के मेडल। फौजियों के इस गांव की कहानी खुद ही बयान कर देती हैं। वर्तमान में गहमर के 15हजार से अधिक लोग भारतीय सेना के विभिन्न अंगों में सैनिक से लेकर कर्नल तक के पदों पर कार्यरत हैं।जबकि 10 हजार से ज्यादा भूतपूर्व सैनिक गांव में रहते है।


बताया जाता है कि सैन्य सेवा को लेकर गहमर की ये परम्परा प्रथम विश्व युद्ध से शुरु हुई। द्वितीय विश्व युद्ध में गहमर के 226 सैनिक अग्रेजी सेना में शामल रहे।जिसमें से 21 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुये। देश भक्ति सैन्य सेवा का ये जुनून अब गहमर वासियों के लिए परम्परा बन चुका है। गहमर की पीढ़ियां दर पीढ़िया अपनी इस विरासत को लगातार संभाले हुये हैं। गहमर के सैनिकों ने सन 1962,1965 और 1971 के युद्धों में भी भारतीय सेना के लिए अपने हौंसले और जज्बे के दम पर मोर्चा संभाला। देश सेवा इस गांव के हर बांशिदे के लिए सबसे बड़ी गर्व की बात है।


फौजियों के इस गांव की एक सच्चाई ये भी है कि आजादी के बाद से आज तक गहमर के सैनिक विभिन्न युद्धो में अपनी वीरता और शौर्यता का परचम तो फहराते रहे,लेकिन आज तक कोई भी शत्रु सेना उनका बाल भी बांका नही कर पायी। गहमर के लोगों की मान्यता है कि उनकी कुल देवी मां कामख्या हर मोर्चे पर गहमर के अपने बेटों की रक्षा स्वयं करती है। यूपी के गाजीपुर जिले के गहमर गांव को पूरे देश में फौजियों के गांव के रुप में पहचाना जाता है। गहमर का हर युवा होश संभालते ही देश सेवा के लिए सेना में भर्त्ती होने के लिए अभ्यास शुरु कर देता है।फौजियों के इस गांव में युवाओं का मकसद सैनिक बनकर देश सेवा ही होता है। पूरा गांव अपने इस जज्बे पर गर्व भी महसूस करता है।

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