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पूर्वांचल में ट्रेनों को 130KM से अधिक की रफ्तार पर चलाने की तैयारी- आसान होगी राजधानी, वंदेभारत को चलाने की राह

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गोरखपुर. पूर्वोत्तर रेलवे के ट्रैक पर ट्रेनों को 130 किमी प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से चलाने की तैयारी शुरू हो गई है। 130 से 180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली राजधानी, वंदेभारत, शताब्दी और दूरंतों आदि देश की प्रमुख गतिमान ट्रेनों की राह आसान हो जाएगी। ट्रेनों की गति के साथ रेल लाइनों की क्षमता बढ़ेगी। एक सेक्शन में एक से अधिक गाड़ियां एक के पीछे एक चल सकेंगे, दुर्घटनाओं पर पूरी तरह अंकुश लगेगा। रूट रिले इंटरलाकिंग पैनल की जगह पूरा सिस्टम कंप्यूटराइज्ड (आनलाइन) हो जाएगा।

रेलवे स्टेशनों पर लगाए जाएंगे इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम

ट्रेनों का संचालन बटन की जगह माउस से होगा। इसके लिए स्टेशनों पर इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम (कियोसन और मेधा) लगाए जाएंगे। जापानी तकनीक वाला यह इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम कियोसन पहले छोटे स्टेशनों पर लगाए जाएंगे। वाराणसी के 14, लखनऊ के चार और इज्जतनगर मंडल के तीन स्टेशनों पर यह सिस्टम लगा दिए गए हैं। आने वाले दिनों में गोरखपुर जंक्शन सहित सभी करीब 500 स्टेशनों पर यह सिस्टम कार्य करने लगेगा। इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम लगाने के साथ सिग्नल एवं दूरसंचार प्रशिक्षण केंद्र गोरखपुर में प्रशिक्षण की व्यवस्था भी शुरू हो गई है। प्रशिक्षण के लिए चार करोड़ की लागत से इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम लगाया जा रहा है।

पैनल के बटन की जगह कंप्यूटर के माउस से संचालित होंगी गाड़ियां

स्टेशन मास्टरों सहित सिग्नल एवं दूरसंचार से संबंधित रेलकर्मियों को प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि सिस्टम को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सके। छह मार्च को गोरखपुर दौरे पर आए रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष विनय कुमार त्रिपाठी ने प्रशिक्षण केंद्र का निरीक्षण कर इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम को लेकर आवश्यक सुझाव और दिशा-निर्देश दिया था। पूर्वोत्तर रेलवे का बाराबंकी-गोरखपुर-छपरा करीब 425 किमी मुख्यमार्ग ट्रेनों के 110 से 130 किमी प्रति घंटे की गति से चलने के लायक बन चुका है। गति और क्षमता बढ़ाने के लिए पटरियों, स्लीपर, प्वाइंट, स्वीच बदलने के साथ डबल डिस्टेंस सिग्नल लगने लगे हैं। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एंटी कोलिजन डिवाइस नेटवर्क कवच लगाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

पांचवें जनरेशन में पहुंचा रेलवे का सिग्नल सिस्टम

रेलवे का सिग्नल सिस्टम पांचवें जनरेशन में पहुंच चुका है। नैरोगेज लाइन पर शुरुआत मैनुअल सिग्नल से हुआ। नैरोगेज मीटरगेज रेल लाइन में परिवर्तित हुआ तो सिग्नल सिस्टम मैकेनिकल हो गया। ट्रेनें टोकन से चलने लगीं। मैकेनिकल सिग्नल सिस्टम अपडेट होकर इलेक्ट्रो मैकेनिकल में बदल गया। इलेक्ट्रो मैकेनिकल के बाद सिस्टम रूट रिले इंटरलाकिंग के रूप में अपडेट हो गया। ब्राडगेज रेल लाइनों पर वर्तमान में ट्रेनें रूट रिले इंटरलाकिंग सिस्टम पर ही चल रही हैं। अब इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम की तैयारी है।

माडल यार्ड में एक साथ प्रशिक्षित होंगे रेलकर्मी

बेहतर और दुर्घटना रहित ट्रेन संचालन को लेकर अब रेलकर्मियों को एक साथ प्रशिक्षित किया जाएगा। इसके लिए सिग्नल एवं दूरसंचार प्रशिक्षण केंद्र गोरखपुर में माडल यार्ड का निर्माण हो रहा है। इस यार्ड में सिग्नल एवं दूरसंचार, इंजीनियरिंग, विद्युत और परिचालन विभाग के रेलकर्मी एक साथ प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।

प्रशिक्षण केंद्र गोरखपुर में पर्यवेक्षकों को उत्कृष्ट ट्रेनिंग देने के लिए आधुनिक सिग्नलिंग, माडल ट्रैक, विद्युत के ओवर हेड इक्विपमेंट्स, कोच एवं लोकोमोटिव के मॉडल्स रखे गए हैं। फील्ड में होने वाली विफलताओं को केस स्टडी के रूप में बताया जा रहा है। जिससे अनुरक्षण के लिए वाह्य एजेंसियों पर निर्भरता कम हो सके। - पंकज कुमार सिंह, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी- पूर्वोत्तर रेलवे।

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