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कहानी: अच्छे लोग

रिचा ने मम्मीपापा को सहारा दे कर कार से उतारा. फिर उन के आगेआगे मकान की तरफ बढ़ी. मकान सन्नाटे में डूबा था. उस के आगे धूल और गंदगी का साम्राज्य था, जैसे महीनों से वहां सफाई नहीं की गई थी. सच भी था, यह मकान लगभग डेढ़ महीने से बंद पड़ा था.

रिचा ने पर्स से चाबी निकाल कर ताला खोला. मकान के अंदर का हाल भी बहुत बुरा था. बंद रहने के बावजूद सारी चीजें धूल से अंटी पड़ी थीं. नमी के कारण एक अजीब भी बदबू हवा में विराजमान थी.


मम्मीपापा को सोफे पर बिठा कर रिचा कुछ सोचने लगी. उस के मम्मीपापा तो जैसे गूंगे और बहरे हो गए थे. वे बिलकुल संज्ञाशून्य थे. आंखें खोईखोई थीं और वे सोफे पर गुड्डेगुडिय़ा की तरह अविचल बैठे हुए थे.


रिचा ने जल्दीजल्दी मम्मीपापा के कमरे की थोड़ीबहुत सफाई कर दी. फिर उन्हें उन के कमरे में बैठा कर बाई को फोन कर उसे जल्दी घर आने के लिए कहा. मम्मीपापा तब तक चुपचाप बैठे रहे.


‘‘पापा, आप अपने को संभालो, इतना सोचने से कोई फायदा नहीं. मम्मी आप लेट जाओ. मैं बाहर से दूधब्रैड ले कर आती हूं. तब तक बाई आ जाएगी. फिर आगे क्या करना है, सोचा जाएगा.’’


रिचा के बाहर जाने के बाद भी उस के मम्मीपापा वैसे ही निश्च्छल बैठे रहे, परंतु अंदर से वे दोनों ही बहुत अशांत थे. उन के हृदय में एक तूफान मचल रहा था. दिमाग में हाहाकार मचा हुआ था. वे समझ नहीं पा रहे थे, उन्हें किस पाप की सजा मिली थी. जीवन में उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जो उन्हें हवालात के सीखचों के पीछे पहुंचा सकता. फिर भी उन्हें सजा मिली थी, एक महीने तक वे पत्नी और बेटे के साथ जेल के अंदर रहे थे. आज जमानत पर छूट कर आए थे. बेटा अभी भी बंद था.


उन के दिमाग में एकजैसे विचार घुमड़ रहे थे-


रमाकांत और शारदा का दांपत्य जीवन बहुत सुखमय था. दोनों ही सरकारी सेवा में थे. संतानें भी 2 ही थीं. बड़ी बेटी रिचा की ग्रेजुएशन के बाद शादी कर दी थी. दामाद अभिनव एक अच्छी कंपनी में एक्जीक्यूटिव था. बेटी भी ससुराल में सुखी थी.


उन का बेटा प्रियांशु एमटैक करने के बाद नोएडा की एक कंपनी में अच्छी सैलरी पर नौकरी करने लगा था. कहीं कोई दुख और अभाव उन के जीवन में नहीं था. बेटे की नौकरी लगते ही उस के रिश्ते की बातें चलने लगी थीं. रमाकांत और शारदा अच्छी लडक़ी की तलाश में थे, परंतु शादी के पहले अच्छीबुरी लडक़ी का पता कहां चलता है.


प्रियांशु की शादी एक रिश्तेदार की बेटी अखिला से हो गई. परंतु जैसे बेटे की शादी के बाद से ही रमाकांत के सुखमय परिवार में राहुकेतु की कुदृष्टि पड़ गई. जिस लडक़ी को अच्छी बहू समझ कर वह घर में लाए थे, उस ने ससुराल की चौखट में कदम रखते ही अपना रूप दिखाना आरंभ कर दिया.


रमाकांत का परिवार बहुत शांतप्रिय था. घर का कोई भी सदस्य ऊंची आवाज में बात नहीं करता था, लड़ाईझगड़ा तो बहुत दूर की बात थी. परंतु बहू ने घर में आते ही घर के शांत माहौल को आग लगा दी. घर के अन्य सदस्य उस आग को बुझाने का प्रयत्न करते, परंतु अखिला हर घड़ी उस में ज्वलनशील पदार्थ डालती रहती थी.


अखिला को पता नहीं क्या परेशानी थी, कोईकोई समझ पा रहा था. घर के किसी काम में वह हाथ नहीं बंटाती थी. सारा दिन कमरे में पड़ी रहती थी. प्रियांशु के दफ्तर जाने के बाद भी वह अपने कमरे से कम ही निकलती थी. सास से नाकभौं सिकोड़ कर बात करती. शारदा बहुत समझदार और सहनशील महिला थीं. वे सोचतीं, बहू नए घर में आई है. नए लोग और नए माहौल में शायद समन्वय नहीं बिठा पा रही होगी. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.


परंतु सबकुछ ठीक नहीं हुआ. अखिला ने साफसाफ कह दिया, वह घर के किसी काम में हाथ नहीं बंटाएगी.


वह घर की बहू थी, नौकरानी नहीं. सब ने एकदूसरे का मुंह देखा और बिना कुछ बोले जैसे सबकुछ समझ गए. अखिला आलसी और कामचोर थी, परंतु अपने पेट के लिए तो कीड़ेमकोड़े और जानवर भी मेहनत करते हैं. अखिला को कब तक कोई बना कर खिला सकता था. इस के बाद भी सभी आशांवित थे कि अखिला एक दिन दुनियादारी का निर्वाह करेगी.


रमाकांत आदतन सवाल कम करते थे, परंतु शारदा ने प्रियांशु से पूछा, ‘‘बहू ऐसा क्यों कर रही है?’’


‘‘पता नहीं,’’ प्रियांशु ने मुंह लटका कर कहा.


‘‘बेटा, तुम उस के पति हो. उस के दिल को टटोल कर देखो. शादी में उस की भी मरजी थी. फिर क्यों घर में अशांति फैला रही है?’’


‘‘ठीक है, पता करूंगा,’’ कह कर उस ने बात को टाल दिया.


परंतु बात टली नहीं, बल्कि और बिगड़ती गई. अब रात में प्रियांशु के कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगी थीं. इन आवाजों में अखिला की आवाज ही प्रमुख होती. प्रियांशु का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वह किसी से लड़ाई कर सकता. न उस के संस्कारों ने उसे मारपीट करना सिखाया था. फिर अखिला के चीखनेचिल्लाने का कारण क्या था?


रमाकांत और शारदा की समझ में कुछ न आता, परंतु उन के मन में भय पसरने लगा था. क्या प्रियांशु की अखिला के साथ शादी कर के उन्होंने कोई गलती की थी. परिवार में रोजरोज की कलह कोई अच्छी बात नहीं थी. सभी अवसादग्रस्त रहने लगे थे.


प्रियांशु मांबाप से कोई बात नहीं बताता था. पता नहीं क्यों? आखिरकार, रमाकांत और शारदा ने तय किया कि वही बेटे से बात करेंगे. अलगे रविवार को सभी लोग नाश्ता कर रहे थे. अखिला उन के साथ न नाश्ता करती थी, न खाना खाती थी. प्रियांशु उस का नाश्ताखाना उस के कमरे में दे आता था.


‘‘बेटा, तुम कुछ बताते नहीं हो. आखिर बहू को इस घर से या हम से क्या परेशानी है? हम तो उसे एक शब्द भी नहीं कहते. वह अपने मन की करती है, फिर तुम्हारे बीच लड़ाईझगड़ा…?’’ इतना कह कर शारदा चुप हो गईं. रमाकांत ध्यान से प्रियांशु का मुंह ताक रहे थे.


प्रियांशु ने अपना हाथ रोक कर कहा, ‘‘मम्मी, मैं स्वयं हैरान और परेशान हूं. वह कुछ बताती ही नहीं. बस, बातबात में गुस्सा करना और बात को बढ़ाते चले जाना उस का स्वभाव है. मैं चुप रहता हूं, तब भी चिल्लाती रहती है.’’


‘‘क्या वह स्वभाव से ही गुस्सैल और चिड़चिड़ी है?’’


‘‘हो सकता है, परंतु हम कुछ भी तो ऐसा नहीं करते, जिस से उसे गुस्सा आए.’’


‘‘कुछ समझ में नहीं आता,’’ रमाकांत ने पहली बार अपना मुंह खोला, ‘‘क्या मैं उस से बात करूं?’’


‘‘कर सकते हैं, परंतु वह बहुत बदतमीज है. जब मेरी नहीं सुनती, जो आप की क्या सुनेगी? कहीं गुस्से में आप की बेइज्जती न कर दे,’’ प्रियांशु ने कहा.


‘‘तो फिर उस के मम्मीपापा से बात कर के देखते हैं. कुछ तो उस के स्वभाव के बारे में पता चले,’’ रमाकांत ने आगे सुझाव दिया.


‘‘देख लीजिए, जैसा आप उचित समझें. मुझे तो कुछ समझ में नहीं आता. हर क्षण यही भय बना रहता है कि पता नहीं किस बात पर वह भडक़ जाए.’’


सच, प्रियांशु मानसिक रूप से बहुत परेशान था. अखिला के सारे प्रत्यक्ष प्रहार वही झेलता था. शारदा और रमाकांत उसे बस धीरज बंधा सकते थे.


रमाकांत ने फोन पर अखिला के पिता अवनीश से बात की. अखिला के व्यवहार के बारे में विस्तार से बताने के बाद पूछा, ‘‘भाईसाहब, हम अपनी तरफ से कोई ऐसा काम नहीं करते कि उसे कोई कष्ट हो, परंतु पता नहीं उसे किस बात की तकलीफ है कि हर पल झगड़े के मूड में रहती है.’’


अवनीश जी ने बताया, ‘‘भाईसाहब, अखिला बचपन से ही क्रोधी और जिद्दी स्वभाव की है. हर काम में अपनी मनमानी चलाती है, चीखचिल्ला कर अपनी ही गलतसही बात मनवा लेती है. हम ने सोचा था- शादी के बाद ठीक हो जाएगी, परंतु…’’


‘‘भाईसाहब, हम तो उसे किसी बात के लिए नहीं टोकते, न उसे कुछ करने के लिए कहते हैं. हमारा बेटा तो ऊंची आवाज में भी बात नहीं करता, फिर भी…और वह कुछ बताती भी नहीं. कुछ कहे तो हम उस के मन की बात भी समझें.’’


‘‘किसी दिन मैं पत्नी के साथ आकर उसे समझाऊंगा,’’ कह कर अवनीश ने बात समाप्त कर दी.


अगले सप्ताह अवनीश पत्नी के साथ रमाकांत के घर आए. उन्होंने अकेले में अखिला से बात की और दोपहर का खाना खा कर चले गए.


उन के जाते ही जैसे घर में तूफान आ गया. अखिला ने अपना रौद्र रूप दिखाते हुए कहा, ‘‘आप लोग क्या समझते हैं अपने को. मैं क्रोधी हूं, जिद्दी हूं, झगड़ालू हूं, तो आप को क्या? यह मेरा स्वभाव है, मैं इसे नहीं बदल सकती. अगर आप को मुझ से कोई तकलीफ है, तो अपना बोरियाबिस्तर उठाइए और कोई दूसरा ठिकाना ढूंढ़ लीजिए. मेरे मम्मीपापा से मेरी शिकायत कर के आप ने अच्छा नहीं किया.’’ अखिला के वाक्यवाण सीधे रमाकांत और शारदा के ऊपर चल रहे थे.


शारदा और रमाकांत ने एकसाथ आंखें फैला कर अखिला को देखा. मन में लज्जा और ग्लानि का भाव भी उपजा. यह उन की बहू थी. कैसा सम्मान दे रही थी उन्हें? उन के मन में उस के प्रति कोई द्वेष नहीं था. आज तक उस से ओछी बात नहीं की थी, परंतु वह पता नहीं किस बात का बदला ले रही थी उन से? उन की क्या गलती थी. बस, यही न कि वह उन की पुत्रवधू थी. अगर उसे इस घर में ब्याह कर नहीं आना था, तो न आती. मना कर देती. उन्होंने कौन सी जबरदस्ती की थी. ब्याह में उस की भी सहमति थी.


रमाकांत ने कुछ कहना उचित नहीं समझा. परंतु शारदा से पति का अपमान सहन नहीं हुआ, थोड़ा तेज आवाज में बोली, ‘‘बेटा, तू बेजान गुड्डे की तरह बैठा है. तुझे दिखाई नहीं दे रहा है, यह किस तरह हमारी इज्जत उतार रही है. किस जन्म का बदला ले रही है ये? हम ने इस का क्या बिगाड़ा है?’’


प्रियांशु को मां की बात से दुख हुआ. उस ने मन में साहस की बिखरी कडिय़ां जोड़ीं और कुछ तेज आवाज में कहा, ‘‘अखिला, मम्मीपापा से इस तरह बात करते हैं? तुम्हें जो कहना है, मुझ से कहो. मम्मीपापा की बेइज्जती मैं बरदाश्त नहीं करूंगा.’’


‘‘वाह रे श्रवण कुमार,’’ अखिला ने उस का उपहास उड़ाते हुए कहा, ‘‘आज पहली बार देख रही हूं, मुंह में जबान भी है तुम्हारे. कल तक तो मेरे सामने मिमियाते रहते थे.’’


प्रियांशु को क्रोध आ गया, ‘‘अखिला, अपनी सीमा पार मत करो. कल तक बात मेरी और तुम्हारी थी. आज तुम ने मम्मीपापा को गाली दी है, उन का अपमान किया है. वह भी अकारण. मेरी समझ में नहीं आता, तुम बेवजह घर में झगड़ा क्यों करती रहती हो? इस से तुम्हें कौन सा सुख मिलता है. परंतु एक बात समझ लो, तुम्हारे कर्म तुम्हें कोई सुख नहीं देंगे. एक दिन तुम पछताओगी.’’


‘‘क्या कर लोगे तुम मेरा?’’ अखिला ने उसे चैलेंज किया.


‘‘मैं क्या करूंगा, यह मैं नहीं जानता, परंतु शांत जल के अंदर हलचल नहीं होती. उस में लहरें नहीं उठतीं, यह कभी मत भूलना.’’


‘‘ओह. तो मुझे तूफान की धमकी दे रहे हो. यही तो मैं चाहती हूं. तूफान आए, और तुम सब उस की चपेट में आ कर तहसनहस हो जाओ.’’


उन सभी के मुख पर जैसे ताले पड़ गए. उन की चुप्पी से अखिला और ज्यादा क्रोधित हो गई, ‘‘तूफान तो मैं लाऊंगी तुम सब की जिंदगी में, देखना मैं क्या करती हूं.’’ और वह पैर पटकती हुर्ई अपने कमरे में चली गई. कुछ देर बाद एक सूटकेस ले कर निकली. तब तक सभी ड्राइंगरूम में दहशत से भरे एकदूसरे का मुंह देखते हुए खड़े थे.


अखिला बाहर निकली तो प्रियांशु ने पूछा, ‘‘कहां जा रही हो?’’


‘‘तुम्हें जहन्नुम में भेजने का इंतजाम करने जा रही हूं, तैयार रहना.’’ और वह तमतमाती हुर्ई चली गई. किसी की हिम्मत न हुई कि उसे रोक ले. रोकने से भी क्या रुकती. परंतु वे सब डर गए थे. कहीं मरखप न जाए और उसे मारने का इलजाम उन के ऊपर आ लगे.


कुछ देर बाद उन्होंने सलाह की कि क्या किया जाए. सब से पहले रमाकांत ने अवनीश को फोन कर के बता दिया कि अखिला घर छोड़ कर चली गई थी. तब तक वह अपने मायके नहीं पहुंची थी. इस के बाद वह देर तक माथापच्ची करते रहे कि आगे क्या किया जाए, परंतु किसी को आगे की कार्रवाई समझ न आई. सो, अभी यह सोच कर चुप हो कर बैठ गए कि जो होगा, देखा जाएगा.


शाम होते ही स्पष्ट हो गया कि उन पर क्या विपत्ति आई थी. अखिला ने उन के जीवन में भयानक तूफान खड़ा कर दिया था.


शाम 6 बजे के लगभग स्थानीय थाने से 2 पुलिस वाले उन के घर आए थे. एक हवलदार, दूसरा सिपाही. हवलदार ने पहले उन के नाम पूछे, फिर कहा- ‘‘आप तीनों को थाने चलना पड़ेगा?’’


तीनों ने पहले शंकित और भयभीत दृष्टि से एकदूसरे की ओर देखा. फिर प्रियांशु ने थोड़ा साहस बटोर कर पूछा, ‘‘क्यों?’’


‘‘आप की पत्नी ने आप लोगों पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करवाया है. दरोगा साहब ने बुलाया है. बाकी पूछताछ वही करेंगे.’’


उन के ऊपर तो जैसे गाज गिर गई. यह कौन से कर्मों की सजा उन्हें मिल रही थी? अखिला को उन्होंने कभी टेढ़ी नजर से भी नहीं देखा, और उस ने अपने सासससुर और पति पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करवा दिया.


किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए. थाने जाने से पहले उन्होंने बेटी रिचा और दामाद अभिनव को फोन कर के बता दिया था कि उन पर क्या विपत्ति आ पड़ी थी.


उन के थाने पहुंचने के थोड़ी देर बाद रिचा और अभिनव भी थाने पहुंच गए थे. उन को दारोगा ने बैठने के लिए कह दिया था. पूछने पर बस इतना बताया था कि अखिला ने उन के खिलाफ मानसिक और शारीरिक प्रताडऩा, हिंसा और अत्याचार का मामला दर्ज करवाया था. पूछताछ के बाद आगे की कार्रवाई होगी.


रात 10 बजे तक वेह लोग थाने में बैठे रहे, परंतु उन से कोई पूछताछ नहीं हुई. बस, उन्हें बताया कि शारदा, रमाकांत और प्रियांशु को गिरफ्तार कर लिया गया था. कल उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा.


यह उन तीनों के लिए ही नहीं, रिचा और अभिनव के लिए भी बहुत बड़़ा आघात था. शारदा, रमाकांत और प्रियांशु को थाने के लौकअप में बंद कर दिया गया था. रिचा और अभिनव घर आ गए. रात में बेचारे वे क्या कर सकते थे.


अगला दिन भी उन के लिए कोई सुखदायी नहीं रहा. पुलिस ने तीनों लोगों को अदालत में पेश कर एक दिन की पुलिस हिरासत में ले लिया था, ताकि उन के बयान दर्ज किए जा सकें. अभिनव ने एक वकील के माध्यम से उन की जमानत की अर्जी डलवाई, परंतु उस की सुनवाई के लिए अगले दिन की तारीख दे दी गई.


पुलिस रिमांड खत्म होते ही शारदा, रमाकांत और प्रियांशु को तीसरे दिन फिर से कोर्ट में पेश किया गया. पुलिस ने उन्हें जेल भेजने की मांग की. बचाव पक्ष की तरफ से उन की जमानत की अर्जी पर भी सुनवाई हुई, परंतु वादी पक्ष के वकील ने इस का पुरजोर विरोध किया. अखिला का बयान भी मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो चुका था. उस ने साफसाफ शब्दों में कहा था कि शादी के दूसरे दिन से उस के सासससुर और पति उस के ऊपर शारीरिक अत्याचार करते थे. हालांकि उस ने स्पष्ट तौर पर यह नहीं बताया कि उस के साथ मारपीट का कारण क्या था. फिर भी मामला संदिग्ध था, इसलिए किसी भी मुलजिम की जमानत स्वीकार नहीं हुई, उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.


एक सप्ताह के अंदर पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. आरोपपत्र में कई लोगों के बयान थे, परंतु किसी के बयान में स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा गया था कि अखिला के साथ मारपीट जैसा कोई मामला हुआ था. उस के मातापिता ने भी इस संबंध में अनभिज्ञता प्रकट की थी.


साक्ष्य कमजोर होते हुए भी शारदा और रमाकांत की जमानत में डेढ़ महीना लग गया. इस का प्रथम कारण यह था कि अदालत में उन के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल हो चुका था. दूसरे, अखिला ने धारा 164 सीआरपीसी के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ खा कर बयान लिखवाया था कि उस के साथ नियमित रूप से मारपीट की जाती थी, उसे मानसिक रूप से परेशान किया जाता था.


कई तारीखों में बहस हुई. अंत में सत्र न्यायालय में उन की जमानत की अर्जी की सुनवाई हुई. सत्र न्यायाधीश ने आरोपपत्र में वर्णित साक्ष्यों पर विचार किया. दोनों पक्षों के तर्क सुने और अंत में यह निर्णय दिया कि शारदा और रमाकांत के विरुद्ध ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिस से यह प्रमाणित होता हो कि उन्होंने अखिला के साथ किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक अत्याचार किया हो, सो उन की जमानत स्वीकार की जाती है. प्रियांशु के बारे में जज ने कहा- चूंकि मामला पतिपत्नी का है और उन के बीच क्या गड़बड़ है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है, सो उस की जमानत स्वीकार नहीं की जा सकती. मुकदमा चलता रहेगा.


आज जमानत पर शारदा और रमाकांत घर आए थे.


रिचा दूध और ब्रैड ले कर आई तो शारदा और रमाकांत की विचारधारा को विराम मिला. पिछले डेढ़ महीनों के दुर्दिनों की अंतकथा उन के दिमाग में उमड़घुमड़ रही थी.


रिचा ने चाय बनाई. तीनों के साथसाथ चाय पी. चाय खत्म हुर्ई तो बाई आ गई. वह उदास सी खड़ी शारदा और रमाकांत को देख रही थी. कर्ई सालों से वह उन के घर में काम कर रही थी. अच्छी तरह उन सब के स्वभाव से परिचित थी. उन के ऊपर आई विपत्ति से वह परिचित थी. उसे दुख था कि प्रकृति भी अच्छे लोगों को परेशान करती है, उन्हें कष्ट देती है.


रिचा ने उस से कहा, ‘‘माला, किचन में थोड़ी चाय बची है, उसे गरम कर के पी लो. फिर घर की सफाई करो. मैं तब तक खाना बना लूंगी.’’


‘‘दीदी, चाय मैं बाद में पी लूंगी. पहले घर की सफाई करती हूं, बहुत गंदा हो गया है.’’


‘‘ठीक है,’’ फिर रिचा ने मम्मीपापा से कहा, ‘‘आप दोनों तब तक नहाधो लीजिए. अभिनव औफिस से हो कर अभी थोड़ी देर में आ जाएंगे.’’


सुबह अभिनव उन के साथ ही था. रिचा को मम्मीपापा के साथ घर भेज कर वह औफिस चला गया था.


अभिनव आया तो सभी लोगों ने साथसाथ खाना खाया. खाते समय आगे की कार्रवाई पर विचार किया गया.


शारदा ने पूछा, ‘‘आगे क्या होगा?’’


‘‘मुकदमा चलेगा, परंतु उस की चिंता नहीं है. हमें सब से पहले प्रियांशु की जमानत करवानी होगी.’’


‘‘कैसे होगी, हमारे पास हमारी बेगुनाही का कोई सुबूत नहीं है,’’ शारदा ने मायूसी से कहा.


‘‘मारपीट का सुबूत तो अखिला के पास भी नहीं है,’’ रिचा ने तर्क दिया.


‘‘सही है, परंतु नवविवाहिता है. उसी ने मुकदमा लिखवाया है. जब तक हम कोई सुबूत नहीं देंगे, उसी की बात सच मानी जाएगी. यह तो गनीमत समझो कि उस ने हमारे खिलाफ दहेज का मुकदमा दर्ज नहीं करवाया, वरना कभी जमानत न हो पाती.’’


‘‘तो फिर अब क्या होगा?’’ शारदा ने ही पूछा.


‘‘कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा. वकील का कहना है कि अखिला के बयान से यह स्पष्ट नहीं है कि हमारा उस के साथ मारपीट करने का क्या कारण है. केस की यही कमजोर कड़ी हमारे पक्ष में जाएगी.’’


‘‘परंतु बेटा, मुकदमा तो न जाने कितना लंबा चले. इतनी जल्दी फैसला कहां आएगा? तुम तो प्रियांशु की जमानत के लिए कुछ करो.’’


‘‘मम्मी, आप इन जैसी शातिर लड़कियों को नहीं जानतीं,’’ अभिनव ने हंस कर कहा, ‘‘जब मांबाप पर इन का जोर नहीं चलता, तो ये ससुराल के लोगों को परेशान करती हैं. घरेलू हिंसा और दहेज का मुकदमा दर्ज करवा कर ये पति से अलग हो जाती हैं. फिर मांबाप भी अपनी मरजी इन पर नहीं चला पाते और तब ये अपने प्रेमी के साथ शादी कर लेती हैं.’’


‘‘अखिला को उलटी पट्टी पढ़ाने में अवश्य उस के प्रेमी का हाथ होगा,’’ रिचा ने कहा, ‘‘हमें अखिला का प्रेमी का पता चल जाए, तो हमारा केस मजबूत हो जाएगा.’’


‘‘हां, अवश्य.’’


‘‘परंतु पता कैसे चलेगा, अखिला के मांबाप तो बताएंगे नहीं. तुम पता करो, कैसे भी?’’ शारदा ने उत्साह से कहा, जैसे अभी सबकुछ सुलझ जाएगा.


‘‘मैं तो पता नहीं कर पाऊंगा. किसी प्राइवेट जासूस की सेवा लेनी पड़ेगी.’’


‘‘तो जल्दी करो बेटो,’’


प्राइवेट जासूस बहुत कुशल था. एक सप्ताह के अंदर ही उस ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ला कर दी. केवल रिपोर्ट ही नहीं दी, साथ में सुबूत भी दिए. अखिला की कौल डिटेल्स और उस की बातचीत की रिकौर्डिंग के साथसाथ अखिला के साथ उस के प्रेमी की तसवीरें भी प्रस्तुत कीं. रिपोर्ट देख कर सब के हृदय को भारी धक्का लगा कि एक लडक़ी अपने प्रेम के लिए किस तरह मांबाप की इज्जत और अपना दांपत्य जीवन चौपट कर सकती है. अखिला इस की बहुत अच्छी मिसाल थी.


रिपोर्ट से यह साबित हो गया था कि अखिला किसी लडक़े को प्यार करती थी, परंतु जाति अलग होने के कारण उस के पिता उस के साथ अखिला की शादी के लिए तैयार नहीं हुए थे. अखिला का प्रेमी कोई अच्छा काम भी नहीं करता था. वह किसी कैटरिंग वाले के यहां काम करता था और किसी शादीब्याह में अखिला से उस की जानपहचान हुई थी. समझ में नहीं आता, लड़कियां किस प्रकार प्रेम में अंधी हो जाती हैं कि उन्हें अपनी पारिवारिक मर्यादा और स्वयं के भविष्य का खयाल नहीं रहता.


प्रियांशु की जमानत के लिए रास्ता आसान हो गया था. अभिनव ने सारे सुबूत अपने वकील के माध्यम से कोर्ट में जमा करवा दिए थे. कोर्ट ने सुनवाई के लिए एक सप्ताह की तारीख दी थी.


शारदा और रमाकांत बहुत हैरान थे. कितने अरमानों से उन्होंने बेटे की शादी की थी. अपने व्यवहार और चरित्र से एक सुखी परिवार की स्थापना की थी. अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दिए थे कि गलती से भी किसी को कष्ट न पहुंचे. परंतु फिर भी उन्हें ऐसी बहू मिली थी जिस के लिए एक घटिया लडक़े का प्यार महत्त्वपूर्ण था और उस का प्यार पाने के लिए वह अपने सुखी दांपत्य जीवन को भी आग में झोंकने पर आमादा थी.


उन्हें जेल की यातना परेशान नहीं कर रही थी. उन्हें तो अखिला का व्यवहार परेशान कर रहा था. क्या इस के बाद वे किसी लडक़ी पर भरोसा कर सकेंगे. उसे बहू बना कर अपने घर में ला सकेंगे.


एक सप्ताह बाद जब कोर्ट में सुनवार्ई हुई, तो शारदा, रमाकांत, अभिनव और रिचा कोर्ट में मौजूद थे. अखिला भी अपने वकील और मांबाप के साथ आई थी. उस के वकील को प्रतिवादी पक्ष का नोटिस मिल चुका था.


प्रियांशु के वकील ने एकएक सुबूत जब अपने तर्कों के साथ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए तो सब की आंखें आश्चर्य और अविश्वास से चौड़ी हो गईं. स्वयं न्यायाधीश हैरान थे. अखिला और उस के मांबाप सिर झुकाए एकतरफ खड़े थे. उन के वकील की बोलती बंद थी. भले ही उस ने सारे सुबूतों को झूठ और गढ़ा हुआ बताया था, परंतु सच को चीखने की आवश्यकता नहीं होती. अखिला और उस की आवाज की रिकौर्डिंग ने सारी साजिश से परदा उठा दिया था. अखिला ने अपने प्रेमी की सलाह पर ससुराल वालों पर मारपीट का झूठा मुकदमा दर्ज करवाया था.


अखिला के वकील ने तर्क दिया, ‘‘मी लार्ड, ये सारे सुबूत झूठे हैं और जानबूझ कर फैब्रिकेट किए गए हैं. इन की कोई फोरैंसिक जांच नहीं हुई है. इन को रिकौर्ड पर ले कर माननीय न्यायालय अपना समय बरबाद कर रहा है. इन की बिना पर मुलजिम को जमानत नहीं दी जा सकती.’’


न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘क्या आप चाहते हैं कि इस की फ़ोरैंसिक जांच हो? अगर हां, तो वादी और उस के तथाकथित प्रेमी की आवाज के सैंपल ले कर जांच करवाई जाए.’’


इस पर वकील ने अखिला और उस के मांबाप की तरफ देखा. अखिला तो अपना सिर इस तरह नीचे झुकाए खड़ी थी जैसे किसी ने उस के ऊपर थूक दिया था. उस के मातापिता ने इनकार में सिर हिला दिया. वकील ने उन के पास आ कर पूछा, ‘‘जांच करवाने में क्या हर्ज है?’’


अखिला के पिता ने कहा, ‘‘मैं जानता हूं, ये सारे सुबूत सही हैं. आगे जांच करवा कर मैं और फजीहत नहीं करवाना चाहता. इस लडक़ी ने हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. आप इस मामले को यहीं समाप्त कर दें.’’


हालांकि कोई वकील ऐसा नहीं चाहता. वह किसी न किसी तरीके से मामलों को बढ़ाते रहना चाहता है लेकिन यहां उस का तर्क किसी काम नहीं आया. अखिला के पिता से स्वयं न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘क्या आप को मुलजिम की जमानत पर कोई एतराज है?’’


‘‘नहीं, मी लार्ड.’’


‘‘वादी का क्या कहना है?’’


अखिला थोड़ा आगे बढ़ कर बोली, ‘‘मुझे कोई एतराज नहीं, परंतु मैं अपनी ससुराल नहीं जाना चाहती.’’


‘‘यह बात मुकदमे के दौरान कहना. आज केवल प्रतिवादी की जमानत की सुनवाई हो रही है.’’


अखिला ने सहमति दे दी. कोर्ट ने प्रियांशु की जमानत मंजूर कर ली. शाम को वह जेल से छूट कर घर आ गया.


अब सारी चीजें शीशे की तरफ साफ थीं. आसमान से धुंध छंट चुकी थी. अखिला के असामान्य व्यवहार का कारण पता चल गया था. रमाकांत के परिवार के पास ऐसे सुबूत आ गए थे कि वे अगली दोतीन सुनवाई में मामले में बाइज्जत बरी हो सकते थे. मामले में बहुत ज्यादा गवाह भी नहीं थे. अखिला का बयान अहम था, परंतु सुबूतों के मद्देनजर उस के बयान की धज्जियां उड़ जाएंगी.


रमाकांत को अखिला के मातापिता की चुप्पी खल रही थी. वे उन से बात करना चाहते थे. जब उन्हें पता था कि उन की बेटी जिद्दी और क्रोधी है, हर प्रकार से अपनी बात मनवा लेती है, तो फिर उन के बेटे से शादी कर के उन्हें क्यों मुसीबत में डाला. शादी भी हो गई, तो क्यों नहीं अपनी बेटी को समझा पाए. घरेलू हिंसा का मामला दर्ज होने के बाद भी उन्हें सचाई से अवगत नहीं कराया. अपनी बेटी का ही पक्ष लेते नजर आए.


रमाकांत ने अवनीश को फोन किया, ‘‘भाईसाहब, हम आप से कुछ बात करना चाहते हैं? क्या आप हमारे घर आ सकते हैं?’’


अवनीश ने शर्मिंदगी के साथ कहा, ‘‘भाईसाहब, मुझे खेद है कि अखिला की वजह से आप के परिवार को इतनी मुसीबत झेलनी पड़ी.’’


‘‘आप चाहते तो यह मुसीबत कम हो सकती थी,’’ रमाकांत ने कुछ तल्खी के साथ कहा.


‘‘मैं समझता हूं कि मुझ से बहुत बड़ी गलती हुई है, परंतु आप मेरी मजबूरी समझ सकते हैं. कोई भी बाप अपनी बेटी को जानबूझ कर बरबादी के गड्ढे में नहीं धकेल सकता. वह जिस लडक़े के साथ शादी करना चाहती थी, उस की न तो कोई सामाजिक हैसियत है, न कोई अच्छा कमानेखाने वाला है.’’


‘‘आप मुझे तो अपने दिल की बात बता सकते थे,’’ रमाकांत ने कहा.


‘‘भाईसाहब, शादीब्याह में कौन मांबाप अपनी बेटी के प्रेम के बारे में बताता है, ये सब बातें तो छिपाई जाती हैं. परंतु मुझे नहीं पता था कि अखिला उस लडक़े के बहकावे में आ कर इस हद तक गिर जाएगी. उसे तलाक चाहिए था तो और भी तरीके थे. आप के खिलाफ हिंसा का मामला दर्ज करवा कर जेल भिजवा दिया. मैं बहुत शर्मिंदा हूं.’’


‘‘आप उसे यह झूठा मुकदमा दर्ज करने से तो रोक सकते थे?’’


‘‘इसी बात का तो मुझे मलाल है. वह आप के घर से निकलने के बाद सीधे थाने गई थी. मुकदमा दर्ज करवा कर ही घर आई थी. मुझे पता ही नहीं चला.’’


‘‘चलिए, अब आप के शर्मिंदा होने से भी क्या फर्क पड़ता है. आप के ऊपर जो कीचड़ उछलना था, वह उछल चुका. हमारे जीवन में जो कष्ट लिखे थे, वह हम भुगत चुके. अब सोचिए, आगे क्या करना है? आप की बेटी क्या चाहती है?’’


‘‘आप लोग क्या चाहते हैं?’’ अवनीश ने बहुत विनम्रता से पूछा.


‘‘अभी हम कुछ नहीं कह सकते. मुकदमा खत्म होगा, तभी कुछ विचार करेंगे. आप क्या समझते हैं कि इतना कष्ट झेलने के बाद, जेल की हवा खाने के बाद क्या हम इतना उदार होंगे कि अखिला को अपने घर की बहू बना कर रख सकें?’’


‘‘हां, भाईसाहब, ऐसा तो मुमकिन नहीं लगता, परंतु आप बहुत उदार हैं, क्षमाशील हैं. अखिला की नादानी को भूल कर उसे माफ कर सकते हैं. उस ने अपने दांपत्य जीवन को बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, परंतु आप चाहेंगे, तो…’’ अवनीश ने जानबूझ कर वाक्य को अधूरा छोड़ दिया.


‘‘आप एक बार अखिला से बात कर के देखिए. अगर वह तलाक चाहती है, तो हम सहर्ष उसे देने के लिए तैयार हैं.’’


‘‘अगर वह आप के घर जाना चाहे तो…?’’


‘‘वह तो भरी अदालत में कह चुकी है कि हमारे यहां नहीं आना चाहती. फिर भी हमें प्रियांशु से बात करनी होगी. सबकुछ उस के ऊपर निर्भर करता है. एक बार हम उस की जिंदगी नर्क बना चुके हैं. दोबारा उसे नर्क में नहीं धकेल सकते.’’


‘‘ठीक है, हम अखिला से बात कर के एकदो दिनों में आप से मिलते हैं.’’


उचित अवसर पर अवनीश ने अखिला को समझाते हुए कहा, ‘‘बेटा, अपने भविष्य के लिए तुम ने जो रास्ता चुना है, वह तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगा. तुम ने देख लिया कि अब तुम मुकदमा नहीं जीत सकतीं. झूठे तथ्यों के आधार पर तुम्हें प्रियांशु से तलाक भी नहीं मिल सकता. अगर वे देना चाहेंगे, तभी यह संभव है, परंतु इतनी मक्कारी और फरेब के बाद भी क्या तुम्हें अक्ल नहीं आएगी कि इज्जतपूर्ण वैवाहिक जीवन अच्छा है या सारे नातेरिश्तों को तोड़ कर एक अजनबी व्यक्ति के साथ जीवन व्यतीत करना. प्रेम विवाह में जीवन की कठिनाइयां बाद में दिखाई देती हैं. मातापिता की सहमति से तय वैवाहिक संबंधों में कठिनाइयों को दूर करने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं, लेकिन प्रेम विवाह में पतिपत्नी ही इन्हें दूर कर सकते हैं. कोई और रिश्तेदार उन के बीच में नहीं आता. अब तुम सोचो, तुम्हें क्या करना है?’’


अखिला मानसिक रूप से परेशान थी. वह समझती थी कि लड़ाईझगड़े से मामले सुलझ जाते हैं और पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से तलाक मिल जाता है. यहां तो मामला ही उलटा पड़ गया था. उस की सारी गोटियां उलटी पड़ गई थीं. कुछ भी आसान नहीं लग रहा था. कोर्ट में मामला पता नहीं कितने दिन तक चलेगा? तब तक वह बूढ़ी नहीं हो जाएगी? उस का प्रेमी कब तक उस का इंतजार करेगा? वह समझती थी, सबकुछ ढकाछिपा रहेगा और घरेलू हिंसा की आड़ में उसे तलाक मिल जाएगा. परंतु उस की सारी पोल खुल गई थी.


अब अगर वह अपने मामले को वापस ले लेती है, तब भी प्रियांशु से तलाश लेने का उस के पास कोई आधार नहीं बनता. उस का मामला झूठ साबित हो गया था. मांगने से क्या प्रियांशु उसे तलाक देगा? उसे और उस के मातापिता को जेल भिजवा कर उस ने अच्छा तो नहीं किया था, परंतु यही बात उस के पक्ष में जाती थी. उस के कर्म का देखते हुए शायद वह उसे तलाक दे दे. प्रियांशु उस के साथ बाकी जीवन क्यों व्यतीत करेगा? क्या उसे माफ कर देगा? ऐसा भला कौन होगा जो अखिला की गलती को माफ कर सकता था. उसे अभी भी आशा की किरण नजर आ रही थी.


उस की मानसिक स्थिति कुछ ऐसी थी कि वह सही निर्णय नहीं ले पा रही थी. उस ने पापा से कहा, ‘‘इतना सब होने के बाद क्या मैं प्रियांशु के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर पाऊंगी.’’


‘‘लगता तो नहीं है, परंतु अगर तुम स्वयं को सुधार सकती हो, तो मैं समझता हूं कि रमाकांतजी का परिवार तुम्हें माफ कर देगा. वे बहुत अच्छे लोग हैं.’’


वह सोच में पड़ गई, फिर बोली, ‘‘अगर वे मुझे तलाक दे दें?’’


अवनीश ने आंखें चौड़ी कर उसे देखा, ‘‘प्रेम का भूत अभी तक तुम्हारे सिर से नहीं उतरा.’’


‘‘पापा, आप ने शादी के पहले मेरी कोई बात नहीं सुनी, इसीलिए मुझे इतना प्रपंच करना पड़ा. अब मेरी सुन लीजिए, शायद बात बन जाए. मुझे नहीं लगता कि मैं प्रियांशु के साथ खुश रहूंगी. मैं ने उसे इतना कष्ट दिया है, उस के मांबाप को जेल भिजवाया है. ऊपर से भले वे लोग कुछ न कहें, परंतु अंदर से कभी माफ नहीं करेंगे.’’


‘‘तुम नहीं सुधरोगी,’’ अवनीश गुस्से से उठ कर अपने कमरे में चले गए. अखिला की मम्मी की समझ में नहीं आ रहा था, कैसी बेटी उन्होंने जनी थी. वे अंदर ही अंदर गुस्से से उफन रही थीं, परंतु कुछ करने की स्थिति में नहीं थीं. बेटी उन्हें अपनी सब से बड़ी दुश्मन लग रही थी.


घर का माहौल बहुत विषैला हो गया था.


अवनीश अपनी बेटी के कृत्य से बहुत दुखी थे. वे अकेले ही रमाकांत के घर गए. सब के सामने उन्होंने हताश स्वर में कहा, ‘‘रमाकांत भाई, बुजुर्ग सही कह गए हैं, आदमी अपनी औलाद से हार जाता है. मैं हार गया, अखिला को समझाना किसी के भी वश में नहीं है.’’


‘‘क्या चाहती है वह?’’ रमाकांत ने स्पष्ट रूप से पूछा.


‘‘किसी भी तरह प्रियांशु से तलाक चाहती है.’’


कुछ पल के लिए सब के बीच डरावना सन्नाटा पसरा रहा. इस सन्नाटे के बीच सब के दिल, बस, धडक़ रहे थे और सांसों की सरसराहट इस बात का यकीन दिला रही थी कि सभी जिंदा थे.


रमाकांत का दिल पहले से ही चकनाचूर था. अखिला के अंतिम निर्णय से पारिवारिक जीवन के सुखचैन की अंतिम किरण भी बुझ गई थी. मरे से स्वर में उन्होंने कहा, ‘‘अब भी अगर वह नहीं सुधरना चाहती तो कोई कुछ नहीं कर सकता. उसे आग से खेलने का शौक है, तो अंगारे खाती रहे. बस, हमें छुटकारा दे दे. हमारी तरफ से कोई अड़चन नहीं है. हम संबंध विच्छेद कर लेंगे.’’


‘‘नहीं पापा,’’ अचानक प्रियांशु की गंभीर आवाज गूंजी.


‘‘क्यों?’’ रमाकांत के मुंह से निकला.


‘‘क्योंकि ऐसी झूठी और फरेबी लड़कियों को सबक सिखाना बहुत आवश्यक है. विवाह एक सोचासमझा बंधन माना जाता है. सुखी दांपत्य जीवन एक अच्छे परिवार और समाज की सुदृढ़ नींव बनता है. हम अखिला जैसी लड़कियों के ओछे व्यवहार से विवाह जैसी संस्था को नष्ट नहीं कर सकते. उसे यह बताना जरूरी है कि वैवाहिक संबंधों को बिना कारण तोडऩा इतना आसान नहीं है कि वह आजाद हो कर अपने प्रेमी से शादी कर ले. मैं ऐसा नहीं होने दूंगा.’’


‘‘बेटा, यह क्या कह रहे हो तुम?’’ अखिला हमारे साथ नहीं रहना चाहती है, तो हम क्यों उस की राह का रोड़ा बने? इस से हमें भी परेशानी होगी.’’


‘‘परेशानी तो होगी, परंतु उस की राह का रोड़ा बन उसे सुधारा भी नहीं जा सकता. वह बेवकूफ है. उस ने मेरे साथ ब्याह किया है. फिर भी दांपत्य जीवन में आग लगा कर वह प्रेमी के साथ घर बसाने के सपने देख रही है. उसे समझना होगा, यह इतना आसान नहीं है. तलाक मिलने तक वह बूढ़ी हो जाएगी. हमारी न्यायिक प्रक्रिया बहुत जटिल है. तलाक लेने की प्रक्रिया तो और भी अधिक जटिल है. हमारा कानून विवाह को महत्त्व होता है, तलाक को नहीं,’’ प्रियांशु ने कहा.


‘‘इस से तो हम भी सालोंसाल कानूनी पचड़े में फंसे रहेंगे. हमारा पारिवारिक जीवन कष्टप्रद हो जाएगा,’’ रमाकांत ने कुछ सोचते हुए कहा.


‘‘परंतु हम गलत परंपरा को बढ़ावा भी नहीं दे सकते. अखिला शादी के पहले कुछ भी कर लेती, परंतु एक बार वैवाहिक बंधन में बंधने के बाद उस की गलत हरकतों को हम मान्यता नहीं दे सकते. हमारे परिवार से उसे कोई तकलीफ नहीं थी, फिर भी उस ने हमें मुसीबत के जाल में फंसा दिया. इस की सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए.”

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