कहानी: भाभी...मेरी माँ बन गईं
ये कहानी है उन रिश्तों की, जो शुरू में कांटों जैसे चुभते हैं, लेकिन समय के साथ इतने गहरे हो जाते हैं कि खून से भी ज्यादा मजबूत बन जाते हैं। प्रिया और नेहा की कहानी – एक भाभी और ननद की, जो पहले एक-दूसरे की दुश्मन लगती थीं, लेकिन आखिरकार माँ-बेटी का वो प्यार पा लिया जो दुनिया में सबसे ऊपर होता है। शुरुआत हुई थी एक सामान्य सी शादी से।
प्रिया, 26 साल की, दिल्ली की एक अच्छी फैमिली से, एमबीए करके नौकरी कर रही थी। उसकी शादी अर्जुन से हुई – एक साधारण सा लड़का, सरकारी नौकरी वाला, लेकिन घर बहुत पुराना और रूढ़िवादी। ससुराल में सास, ससुर और बस एक ननद – नेहा। नेहा सिर्फ 22 की थी, बीए फाइनल ईयर में, घर की लाडली, सबकी जान। अर्जुन उसका सबसे बड़ा भाई था, जो हमेशा नेहा की हर बात मानता था। नेहा को लगता था कि भाई अब सिर्फ भाभी का हो गया है।शादी के अगले ही दिन नेहा ने प्रिया से पहला ताना मारा।
"भाभी, ये जो तुमने लहंगा पहना है, वो तो बहुत सादा है। शहर में तो ब्राइडल लहंगे चमकदार होते हैं ना?"
प्रिया ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, "नेहा, मैंने सोचा घर में सादगी अच्छी लगेगी।" लेकिन अंदर से वो दुखी हो गई। वो सोच रही थी – क्या मैं यहां कभी अपनी जगह बना पाऊँगी?पहले हफ्ते में ही नेहा की हर बात चुभन बन गई।
सुबह उठते ही – "भाभी, चाय में चीनी ज्यादा डाल दी, भाई को मीठा पसंद नहीं।"
दोपहर में – "भाभी, ये सब्जी तो कड़वी हो गई, तुम्हें कुकिंग आती भी है?"
शाम को – "भाभी, मेरे कमरे का दरवाजा मत खोलना, मैं पढ़ रही हूँ।" प्रिया चुपचाप सब सहती। वो जानती थी कि नेहा का गुस्सा असल में प्यार का है – भाई को किसी और के साथ देखना उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। रात को जब सब सो जाते, प्रिया छत पर जाकर रोती। फोन पर माँ से बात करती – "माँ, नेहा मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करती। मैं क्या करूँ?" माँ कहतीं, "बेटी, सब्र रख। एक दिन वो खुद समझ जाएगी कि तू उसकी कितनी अच्छी भाभी है।"समय बीतता गया। नेहा का कॉलेज खत्म हुआ। उसने नौकरी की तलाश शुरू की, लेकिन साथ ही उसका एक लड़का – राहुल – से प्यार हो गया। राहुल शहर का था, अच्छा दिखने वाला, अच्छी जॉब वाला। नेहा उसे घर लाई, सबको मिलवाया। प्रिया ने देखा तो नेहा की आँखों में चमक थी। प्रिया ने नेहा से कहा, "बहुत अच्छा लड़का है, नेहा। खुश रहना।" लेकिन नेहा ने ठंडे लहजे में कहा, "भाभी, तुम्हें क्या? तुम तो बस घर संभालो।"राहुल ने नेहा से शादी का वादा किया। नेहा सपने देखने लगी। लेकिन एक दिन राहुल का फोन आया – "नेहा, सॉरी।
तेरी फैमिली बहुत पुरानी सोच वाली है। मेरे मम्मी-पापा नहीं मानेंगे। मैं नहीं कर सकता।" नेहा का संसार उजड़ गया। वो घर लौटी, कमरे में बंद हो गई। तीन दिन तक कुछ नहीं खाया। आँखें लाल, चेहरा पीला, शरीर कमजोर। सास ने कहा, "ऐसे लड़कों के लिए रोना नहीं चाहिए। भूल जा।" लेकिन नेहा रोती रही। रात को चीखती – "क्यों छोड़ गया मुझे? मैंने क्या गलती की?"प्रिया ने सब देखा। उसका दिल पसीज गया। वो चुपके नेहा के कमरे के बाहर बैठती, दरवाजे से सुनती। एक रात नेहा की चीख सुनकर प्रिया अंदर चली गई। नेहा ने उसे देखा तो चिल्लाई, "जाओ! मुझे अकेला छोड़ दो!" प्रिया रुकी नहीं। वो नेहा के पास बैठ गई, उसका हाथ थामा। "नेहा, मैं जाऊँगी नहीं। तू रो रही है, तो मैं भी रो रही हूँ।" नेहा फूट-फूटकर रो पड़ी। "भाभी... वो मुझे इस्तेमाल करके चला गया। मैंने उसे इतना प्यार किया... मैं कितनी बेवकूफ हूँ। अब जीने का मन नहीं करता।" प्रिया ने नेहा को सीने से लगाया। उसकी आँखों से भी आंसू बह रहे थे। "नेहा, तू बेवकूफ नहीं है। तूने प्यार किया, वो गलत था। मैं भी एक बार ऐसी ही थी। शादी से पहले एक लड़के ने मुझे बहुत धोखा दिया। मैंने सोचा था जिंदगी खत्म हो गई।
लेकिन माँ ने कहा – बेटी, दर्द से गुजरकर ही इंसान मजबूत बनता है। तू मेरी छोटी बहन है। मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी।"नेहा ने पहली बार प्रिया को कसकर गले लगाया। "भाभी... सॉरी। मैंने तुम्हें बहुत तंग किया। तुम हमेशा मेरे लिए अच्छी थीं, और मैं... मैं जलती थी। मुझे डर था कि भाई अब सिर्फ तुम्हारा हो गया।"प्रिया ने नेहा के आंसू पोंछे। "नेहा, भाई हम दोनों का है। तू उसकी छोटी बहन है, मैं उसकी बीवी। हम दोनों मिलकर उसे खुश रखेंगे।"उस रात से नेहा बदलने लगी। प्रिया ने उसे बाहर निकाला। साथ घूमने गईं, आइसक्रीम खाईं, फिल्में देखीं। प्रिया ने नेहा को रिज्यूमे बनवाया, इंटरव्यू की तैयारी कराई। नेहा को अच्छी जॉब मिल गई। लेकिन दिल का घाव अभी भी कच्चा था। रात को कभी-कभी वो रोती, प्रिया उसके पास बैठती, सिर सहलाती।फिर एक दिन सास ने नेहा की शादी की बात शुरू की। एक लड़का आया – रोहन, अच्छा परिवार, अच्छी कमाई। नेहा मिलने गई, लेकिन डर रही थी। "भाभी, अगर फिर धोखा हुआ तो? मैं फिर टूट जाऊँगी।"प्रिया ने कहा, "चल, मैं तेरे साथ जाऊँगी। हम दोनों मिलकर देखेंगे।" सास ने मना किया – "बहू को क्या ले जाना है? लड़की की माँ-बाप देखेंगे।" लेकिन नेहा अड़ी – "मैं भाभी के बिना नहीं जाऊँगी।
भाभी मेरी ताकत हैं।"दोनों गईं। रोहन ने बात की, लेकिन प्रिया ने नोटिस किया – वो बार-बार फोन देख रहा था, नेहा की आँखों में नहीं देख रहा था। बात खत्म होने पर प्रिया ने नेहा को बाहर बुलाया। "नेहा, ये लड़का ठीक नहीं लग रहा। वो दिल से नहीं, दिखावे से बात कर रहा है।"नेहा रो पड़ी। "भाभी, अब क्या होगा? मम्मी-पापा कहेंगे मैं नखरे कर रही हूँ। सब मुझे दोष देंगे।"प्रिया ने नेहा को गले लगाया। "तू मेरी बेटी जैसी है। तेरी खुशी सबसे पहले। मैं घर जाकर सब संभाल लूँगी। तू चिंता मत कर।"घर लौटकर प्रिया ने सास से कहा, "माँ जी, नेहा अभी तैयार नहीं है। उसका दिल अभी टूटा है। शादी पर दबाव मत डालिए।" सास गुस्से में आ गईं। "तू कौन होती है फैसला करने वाली? तू तो कल आई है, आज मेरी बेटी की जिंदगी तय करेगी? घर संभालती नहीं, बस नौकरी-नौकरी करती है!"प्रिया की आँखें भर आईं, लेकिन वो चुप रही। नेहा बीच में आई। "माँ जी, भाभी सही कह रही हैं। मैं भाभी के बिना कुछ नहीं करूँगी। भाभी ने मुझे उस अंधेरे से निकाला जहाँ मैं मर रही थी। अगर भाभी नहीं होतीं तो मैं आज जिंदा नहीं होती।"सास चौंकीं। उनकी आँखें भीग गईं। उन्होंने पहली बार प्रिया को ऐसे देखा जैसे कोई माँ बेटी को देखती है। "प्रिया... तूने मेरी बेटी को..."उस रात नेहा को अचानक तेज बुखार चढ़ आया। पुरानी यादें सता रही थीं। वो बिस्तर पर कराह रही थी – "भाभी... मत छोड़ना... मुझे अकेला मत छोड़ना..." प्रिया रात भर जागी। नेहा का माथा ठंडा पानी से पोंछती, दवा पिलाती, हाथ थामे रोती। "नेहा, मेरी गुड़िया... मेरी जान... ठीक हो जा। तू मेरे बिना कैसे रहेगी? मैं तुझे खो नहीं सकती।
"सुबह नेहा की आँख खुली। प्रिया थकी हुई, आँखें लाल, लेकिन मुस्कुरा रही थी। नेहा ने कमजोर आवाज में कहा, "भाभी... तुम रात भर जागी रहीं? तुम सोई नहीं?"प्रिया रो पड़ी। "क्योंकि तू मेरी बेटी है, नेहा। अगर तुझे कुछ हुआ तो मेरा दिल रुक जाएगा। तू मेरी दुनिया है।"नेहा की आँखों से आंसू बह निकले। वो बिस्तर से उठकर प्रिया के पैरों पर गिर पड़ी। "भाभी... नहीं... दीदी... माँ... मैंने तुम्हें कभी बहन नहीं समझा। मैंने तुमसे जलन की, ताने मारे। लेकिन आज... तुम मेरी असली माँ हो। तुमने मुझे मौत के मुँह से खींचकर वापस लाई। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती।"प्रिया ने नेहा को उठाया। दोनों एक-दूसरे से कसकर लिपट गईं। आंसू बहते रहे। सास बाहर खड़ी सब सुन रही थीं। उनकी आँखें भर आईं। वो कमरे में आईं, दोनों को गले लगाया। "प्रिया बेटी... मैंने बहुत गलती की। मैंने तुझे कभी नहीं समझा। तूने मेरी नेहा को बचाया। तू मेरी बहू नहीं... मेरी बेटी है।
"उस दिन से घर बदल गया। सास अब प्रिया को "बेटी" कहकर पुकारतीं। नेहा प्रिया के साथ हर काम करती – रसोई में मदद, कपड़े धोना, सब कुछ। प्रिया नेहा को "मेरी गुड़िया" कहती।कुछ महीने बाद नेहा ने खुद एक लड़के को चुना – विक्रम। अच्छा, समझदार, नेहा को सच्चा प्यार करने वाला। शादी हुई। विदाई के दिन नेहा ने प्रिया के पैर छुए। "माँ... दीदी... मैं कभी नहीं भूलूँगी। तुमने मुझे दर्द सिखाया, प्यार सिखाया, जीना सिखाया।"प्रिया रोते हुए बोली, "जा मेरी जान। लेकिन याद रखना – ये घर, ये दिल, ये माँ हमेशा तेरी इंतजार करेगी।"शादी के बाद नेहा जब भी आती, सबसे पहले प्रिया को गले लगाती।
"माँ, तुम्हारे बिना अधूरी हूँ।" प्रिया नेहा के बच्चों को गोद में लेती, "मेरी पोती-पोता... नानी आई है।"एक शाम नेहा ने प्रिया को एक पुरानी सोने की चेन दी – जो उसकी अपनी दादी ने उसे दी थी। "ये तुम्हारे लिए, माँ। क्योंकि तुम मेरी असली माँ हो। तुमने मुझे वो प्यार दिया जो कोई और नहीं दे सकता।"प्रिया रो पड़ी। "नेहा... तूने मुझे माँ का दर्जा दिया। मैं सबसे खुश हूँ।"घर में अब सिर्फ प्यार था। झगड़े खत्म, ताने खत्म। ननद-भाभी का रिश्ता माँ-बेटी में बदल गया। क्योंकि सच्चा प्यार वही है जो दर्द को सहकर भी मुस्कुरा दे, आंसुओं को पोंछकर भी गले लगा ले। अंत
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