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कहानी: मैंने सास को माँ कहा

कभी-कभी एक थप्पड़ इतना गहरा मारता है कि वो सिर्फ गाल पर नहीं, दिल पर भी लग जाता है।
मैं श्रद्धा... उस रात जब मेरी सास ने मुझे थप्पड़ मारा, मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। गरम चाय का केतली गिरा था, जलन हुई थी, लेकिन उस थप्पड़ ने दर्द से ज्यादा कुछ और तोड़ा – मेरा आत्मसम्मान।
मैं रोई नहीं उस वक्त। बस चुपचाप कमरे में चली गई। लेकिन अंदर से कुछ टूट चुका था। मैंने सोचा – शायद ये घर मेरा नहीं है। शायद मैं यहां बस एक मेहमान हूँ।
फिर भी... मैं चली गई मायके। सोचा था कि कभी वापस नहीं लौटूँगी।
लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिखा था।  एक फोन आया... रात के 3 बजे।
"श्रद्धा... माँ... दिल का दौरा पड़ा है। बहुत बुरी हालत है। डॉक्टर कह रहे हैं... शायद..."
राहुल की आवाज कांप रही थी। मैंने फोन रख दिया। लेकिन आंसू रुक नहीं रहे थे।
मैंने ट्रेन पकड़ी। रात भर रोती रही। सोचती रही – क्यों जा रही हूँ? वो औरत जिसने मुझे इतना दुख दिया, उसके लिए क्यों?
फिर भी... दिल कह रहा था – जा। क्योंकि वो मेरी सास है। क्योंकि वो मेरे बच्चे की दादी है। क्योंकि... शायद वो भी इंसान है।  अस्पताल पहुंची तो सरोज देवी बिस्तर पर थीं। आँखें बंद। सांसें तेज। मैं उनके पास बैठ गई। उनका हाथ थामा।
उनकी आँख खुली। मुझे देखकर वो चौंकीं।
"तू... आई?" उनकी आवाज इतनी कमजोर थी कि लग रहा था हवा में घुल जाएगी।
मैं रो पड़ी – "हाँ माँ जी... मैं आई हूँ।"  और फिर... वो हुआ जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
सरोज देवी की आँखों से आंसू बहने लगे। पहली बार मैंने उन्हें रोते देखा।
"श्रद्धा... बेटी... मैंने तुझे बहुत सताया। मैंने सोचा तू शहरी है... नखरेबाज है... लेकिन तू तो मेरी बेटी निकली। मुझे माफ कर दे..."  उस रात अस्पताल के उस कमरे में... सास-बहू का झगड़ा खत्म हो गया।
बस एक माँ और बेटी का रिश्ता शुरू हो गया।  अब पूरी कहानी शुरू से...मेरा नाम श्रद्धा है। मुंबई में पली-बढ़ी, अच्छी पढ़ाई की, अच्छी नौकरी थी। लेकिन प्यार में पड़कर सब छोड़ दिया। राहुल से शादी हुई। वो सरकारी नौकरी करता था, अच्छा इंसान था, लेकिन उसका घर बहुत पुराना था – हवेली जैसा, जिसमें सास सरोज देवी का राज चलता था।  शादी के पहले दिन से ही सब बदल गया। सरोज देवी ने मुझे देखते ही कहा – "शहरी लड़की है, देखना घर कैसे संभालती है।"
मैंने सोचा – मैं कोशिश करूँगी। सबका दिल जीत लूँगी।  सुबह 5 बजे उठती। चाय बनाती। नाश्ता बनाती। झाड़ू लगाती। कपड़े धोती। लेकिन सरोज देवी को कुछ भी पसंद नहीं आता था।  "ये चाय तो फीकी है। चीनी कम डाली क्या?"
"बर्तन में दाग रह गए। ऐसे कैसे चमकेंगे?"
"साड़ी पहनकर रसोई में मत घुसो। नई साड़ी गंदी हो जाएगी। नई-नई आई हो, अभी से नखरे?"  मैं चुप रहती। मुस्कुराकर कहती – "जी माँ जी, अगली बार ध्यान रखूँगी।" लेकिन रात को जब सब सो जाते, मैं छत पर जाकर रोती। माँ को फोन करती – "माँ, बहुत मुश्किल हो रहा है।" माँ कहतीं – "बेटी, सब्र रख। ससुराल में सब्र ही सबसे बड़ा हथियार है।"राहुल को पता था। वो कहता – "माँ का दिल रख लो। वो समय के साथ बदल जाएँगी।" लेकिन वो खुद माँ से डरता था। कभी मेरी तरफ से बोलता नहीं।फिर एक दिन मुझे पता चला कि मैं प्रेग्नेंट हूँ। बहुत खुशी हुई। मैंने सरोज देवी को बताया। उन्होंने मुस्कुराकर कहा – "बहुत अच्छा। लेकिन अब और सावधानी रखना। काम मत छोड़ना। बच्चा आएगा तो घर में और काम बढ़ेगा।"पेट बड़ा होने लगा। मैं थकने लगी। डॉक्टर ने कहा – "आराम करो। ज्यादा काम मत करो।" मैंने राहुल को बताया। वो सरोज देवी से बोला। लेकिन सरोज देवी ने कहा – "आराम? मैंने तो सात महीने तक खेत में काम किया था। बहू बनकर अब आराम करेगी?"मैं चुप रही। लेकिन अंदर से दुख होता।एक शाम मैं रसोई में खड़ी थी। चक्कर आया। मैं गिर पड़ी। गरम पानी का बाल्टी पैर पर गिर गया। जलन हुई, चीख निकली। सरोज देवी दौड़ी आईं।
"हाय राम! क्या कर रही थी? घर जलाने आई है क्या?"
फिर... उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा। जोरदार थप्पड़। मेरा गाल लाल हो गया। आँखों से आंसू बहने लगे।  मैं कुछ नहीं बोली। बस उठी, कमरे में चली गई। राहुल आया तो बोला – "माँ गुस्से में थीं। माफ कर दो।"
मैंने कहा – "राहुल, मैं मायके जाना चाहती हूँ। थोड़े दिन। मुझे साँस लेने की जरूरत है।"राहुल ने बहुत मना किया। लेकिन मैं नहीं मानी। अगले दिन बैग पैक किया और चली गई।मायके पहुंची तो माँ ने गले लगाया। रोईं। "बेटी, क्या हुआ?" मैंने सब बताया। माँ ने कहा – "सहन कर। लेकिन अगर बहुत दुख हो तो मत सहना।"दिन बीतने लगे। सरोज देवी को लगा अब घर में शांति है। लेकिन शांति नहीं थी। सुबह उठकर चाय खुद बनातीं। लेकिन स्वाद नहीं आता। रसोई में अकेले खड़ी रहतीं। राहुल चुप रहता। घर सूना लगने लगा। सरोज देवी रात को नींद नहीं आती। वो सोचती – "बहू चली गई तो घर खाली हो गया। पहले तो झगड़ा होता था, लेकिन आवाजें तो थीं। अब सन्नाटा है।"दो महीने बीत गए। मेरे पेट में बच्चा अब चार महीने का था। मैं मायके में आराम कर रही थी।  एक रात फोन की घंटी बजी। राहुल का फोन।
"श्रद्धा... माँ को दिल का दौरा पड़ा है। अस्पताल में हैं। डॉक्टर कह रहे हैं हालत गंभीर है। प्लीज... आ जाओ।"
उसकी आवाज में रोना था।  मैं स्तब्ध हो गई। फोन रख दिया। लेकिन आंसू बहने लगे। मैं सोचने लगी – क्यों जाऊँ? वो औरत जिसने मुझे थप्पड़ मारा, जिसने मुझे अपमानित किया। लेकिन फिर दिल बोला – वो तुम्हारी सास है। वो तुम्हारे बच्चे की दादी है। अगर कुछ हो गया तो...?  मैंने फैसला किया। रात के 2 बजे टिकट बुक किया। ट्रेन पकड़ी। रास्ते भर रोती रही। सोचती रही – अगर वो ठीक नहीं हुईं तो? अगर वो मुझे देखकर कुछ कहेंगी तो?अस्पताल पहुंची। सुबह के 6 बज रहे थे। राहुल बाहर खड़ा था। आँखें लाल। मुझे देखकर रो पड़ा। "श्रद्धा... तू आ गई..."  मैं अंदर गई। सरोज देवी ऑक्सीजन पर थीं। आँखें बंद। मैं उनके पास बैठ गई। उनका हाथ थामा। हाथ ठंडा था। मैं धीरे से बोली – "माँ जी... मैं आई हूँ।"धीरे-धीरे उनकी आँख खुली। मुझे देखा। चौंकीं।
"तू... आई?" आवाज बहुत कमजोर।  मैं रो पड़ी। "हाँ माँ जी... मैं आई हूँ। आप ठीक हो जाइए।"उनकी आँखों में आंसू आ गए। वो रो पड़ीं। पहली बार मैंने उन्हें रोते देखा।
"श्रद्धा... बेटी... मैंने तुझे बहुत दुख दिया। मैंने थप्पड़ मारा... तुझे अपमानित किया... मैंने सोचा तू शहरी है, घर नहीं संभाल सकती। लेकिन तू तो मेरी बेटी निकली। तू मायके से इतनी दूर आ गई... मेरे लिए... मुझे माफ कर दे बेटी..."मैं उनके हाथ को चूम रही थी। "माँ जी... सब भूल गई। आप बस ठीक हो जाइए।"हम दोनों रोए। गले लग गए। वो कमजोर हाथों से मुझे सहला रही थीं। "बेटी... तू मेरी बेटी है। सास नहीं... माँ बनूँगी तेरी।"डॉक्टर आए। कहा – "अब हालत स्थिर है। स्ट्रेस कम हो गया है।"कुछ दिन बाद सरोज देवी घर लौटीं। अब सब बदल गया। वो मुझे "बेटी" कहकर पुकारतीं। रसोई में आने नहीं देतीं। "तू आराम कर। बच्चा है पेट में।" मेरे पैर दबातीं। तेल लगातीं। कहानी सुनातीं अपनी जवानी की।मेरा डिलीवरी का समय आया। दर्द शुरू हुआ। अस्पताल ले गए। सरोज देवी बाहर रो रही थीं। "हाय राम... मेरी बेटी को कुछ न हो।"बच्ची हुई। बहुत सुंदर। नाम रखा – राधिका। सरोज देवी ने गोद में ली। रो पड़ीं – "मेरी पोती... मेरी बेटी ने मुझे ये सौगात दी।"एक शाम सरोज देवी ने मुझे पास बुलाया।
"बेटी... आज मैंने तेरे लिए कुछ लाया है।"
एक छोटी डिबिया दी। अंदर सोने की पुरानी चेन थी। "ये मेरी माँ ने मुझे दी थी शादी में। अब तुझे दे रही हूँ। क्योंकि तू मेरी असली बेटी है।"मैं रो पड़ी। "माँ जी... आपने मुझे माँ का प्यार दिया। मैं सबसे खुश हूँ।"आज घर में हंसी है। प्यार है। कोई झगड़ा नहीं। सास-बहू नहीं – बस माँ और बेटी। राधिका को सरोज देवी "नानी" कहकर बुलाती हैं। मैं उन्हें "माँ" कहती हूँ।  कभी-कभी रात को सरोज देवी मेरे पास आकर बैठती हैं। कहती हैं – "बेटी... तू न होती तो मैं आज नहीं होती। तूने मुझे नई जिंदगी दी।"और मैं कहती हूँ – "माँ... आपने मुझे माँ बनाया।" अंत
 
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