कहानी: आखिरी सांस तक वादा
रात के ढाई बज चुके थे।
दिल्ली की सड़कें पूरी तरह सुनसान और भीगी हुईं। बारिश की बूंदें छत पर इतनी तेज़ गिर रही थीं जैसे कोई अनगिनत हाथ दरवाज़ा पीट रहे हों – "खोलो... खोलो... जिंदगी खत्म हो रही है।"
अंजलि बिस्तर पर बैठी थी, घुटनों से सिर टिकाए। उसका फोन लगातार कंपन कर रहा था। स्क्रीन पर नाम जल रहा था – "आरव 💔" ये इमोजी उसने खुद लगाया था। छह महीने पहले, जब आरव ने पहली बार कहा था –
"अंज... कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं तुझे वो खुशी नहीं दे पाऊँगा जो तू डिज़र्व करती है। मैं थक रहा हूँ... बहुत थक गया हूँ।" उस रात अंजलि ने हँसकर टाल दिया था।
"पागल मत बनो। थकान तो आएगी-जाएगी। तू मेरा है, मैं तेरी। बस।" लेकिन आज वो इमोजी दिल में चाकू की तरह चुभ रहा था। अंजलि ने फोन उठाने से पहले पाँच बार सांस ली। हाथ काँप रहे थे। आखिरी कॉल में आरव की आवाज़ इतनी कमजोर, इतनी टूटी हुई थी कि लग रहा था जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत गहरे कुएँ से पुकार रहा हो। "अंजलि... मैं मर रहा हूँ... और ये... सच है।" फिर लाइन कट गई थी। उसने तुरंत कॉल बैक किया।
दूसरी तरफ़ सिर्फ़ सांसें। भारी। दर्द से भरी। टूटी-टूटी। जैसे कोई आखिरी साँसें गिन रहा हो। "आरव...?" उसकी आवाज़ फट गई। गला रुँध गया। कोई जवाब नहीं।
बस सांसें। फिर एक धीमी, काँपती आवाज़ आई –
"अंज... मैं... तुझे... आखिरी बार... देखना चाहता हूँ... प्लीज़... आ जा... बस एक बार... फिर कभी नहीं... तंग करूँगा..." "कहाँ है तू?! बोल ना! अस्पताल कौन सा?! क्या हुआ है?!" अंजलि चीख पड़ी। आंसू बहने लगे, बिना रुके। उसकी साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर चुका था। बाल बिखरे। आँखें लाल। लेकिन उसे कुछ दिख नहीं रहा था – सिर्फ़ अंधेरा और डर। "म... मत आना... बस... सुन लेना... मैंने... कभी... तुझे... धोखा नहीं दिया... मैं... तुझसे... बहुत... बहुत प्यार करता हूँ... हमेशा... करता रहूँगा..." फिर एक लंबी खामोशी।
अचानक फोन गिरने की आवाज़।
कुछ गिरने की। शायद ग्लास। शायद शरीर।
कॉल डिस्कनेक्ट। अंजलि का दिल एक पल के लिए रुक गया।
वो ज़ोर से चीखी। रोई। अपने बाल नोचने लगी।
"नहीं... नहीं... आरव... नहीं!" फिर बिना कुछ सोचे मुख्य दरवाज़ा खोला।
बाहर बारिश। तेज़। ठंडी।
वो सिर्फ़ एक पतली शॉल ओढ़े बाहर निकल पड़ी। पैरों में चप्पलें भी नहीं।
बारिश में पूरी तरह भीगती हुई दौड़ने लगी।
सड़क पर कोई नहीं।
वो बीच सड़क पर खड़ी होकर चीख रही थी –
"कोई... कोई मदद करो! प्लीज़! मेरे पति... वो... मर रहे हैं! अस्पताल... प्लीज़!" एक ऑटो वाला रुका। उसकी आँखें देखकर वो खुद घबरा गया।
"बीबी जी... क्या हुआ? कहाँ जाना है?"
"सफदरजंग अस्पताल... जल्दी... बहुत जल्दी... प्लीज़..." ऑटो चला। बारिश में।
अंजलि पीछे बैठी रो रही थी। हाथ जोड़े।
"भगवान... उसे बचा लो... मैं कुछ भी कर लूँगी... बस उसे मत ले जाना...
● तीन साल पहले – वो पहली मुलाकात ● वो एक पुरानी, धूल भरी लाइब्रेरी थी – कनॉट प्लेस के पास, जहाँ समय रुक सा जाता था।
बारिश हो रही थी। बाहर ठंडी हवा। अंदर किताबों की वो खुशबू जो दिल को सुकून देती है। अंजलि "गुनाहों का देवता" पढ़ रही थी।
पन्ने पलटते-पलटते आँखें नम हो गईं। चरित्रों का दर्द उसे अपना लग रहा था। जैसे किताब उसके लिए लिखी गई हो। पीछे से एक नरम आवाज़ आई –
"ये किताब पढ़कर रोना नहीं चाहिए... क्योंकि इसका अंत खुश नहीं होता।" अंजलि ने मुड़कर देखा।
एक साधारण सा लड़का। हल्की दाढ़ी। थकी लेकिन गहरी आँखें। सफेद शर्ट पर हल्का सा कॉफी का दाग। मुस्कान ऐसी कि लगे जैसे वो सालों से जानता हो उसे। "तुम्हें कैसे पता?" उसने पूछा, आंसू पोंछते हुए।
"क्योंकि मैंने इसे दस बार पढ़ा है... और हर बार रोया हूँ।" आरव ने जवाब दिया। "लेकिन फिर भी पढ़ता हूँ... क्योंकि इसमें प्यार इतना सच्चा है कि दर्द भी मीठा लगता है।" उस दिन से बातें शुरू हुईं।
लाइब्रेरी के बाहर कॉफी।
फिर लंबी सैरें राजपथ पर।
फिर वो शाम जब आरव ने कहा –
"अंजलि... अगर कभी मैं चला जाऊँ... तो याद रखना... मैंने तुझे कभी नहीं छोड़ा। मैं बस... थक गया था। बहुत थक गया था।" अंजलि हँसी थी।
"पागल मत बनो। तुम कहीं नहीं जाओगे। मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगी। कभी नहीं।" लेकिन आरव की आँखों में एक छिपा हुआ डर था।
एक राज़।
जो वो छुपा रहा था।
जैसे कोई जानता हो कि समय बहुत कम है। शादी के बाद ज़िंदगी सपनों जैसी लगने लगी।
छोटा सा 2BHK फ्लैट – रोहिणी में।
सुबह आरव के लिए अदरक वाली चाय बनाना।
उसके लिए लंच बॉक्स पैक करना।
रात को एक-दूसरे की बाहों में सोना।
आरव की IT कंपनी में प्रमोशन हुआ।
अंजलि ने अपनी मार्केटिंग जॉब छोड़ दी – घर संभालने के लिए। फिर धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं।
आरव रात-रात भर ऑफिस से लौटता।
कभी फोन बंद।
कभी अचानक कहता – "मुझे कुछ दिन अकेले रहना है... दिमाग साफ करना है।" अंजलि पूछती – "क्या हुआ है आरव? कुछ तो बता। मैं तेरी बीवी हूँ।"
वो मुस्कुराता – "कुछ नहीं... बस थकान है।" एक रात अंजलि को आरव का फोन मिला।
एक मैसेज – "डॉक्टर ने कहा है... 6 महीने से ज्यादा नहीं।" उसका हाथ काँप गया।
वो दौड़कर आरव के पास गई।
"ये क्या है? ये मैसेज किसका है?" आरव ने आँखें झुका लीं।
"मेरा... ब्रेन ट्यूमर है। लास्ट स्टेज।
मैंने तुझे नहीं बताया... क्योंकि तू टूट जाती। मैं चाहता था कि तू मेरे साथ खुश रहे... न कि मेरी मौत का इंतज़ार करे।" अंजलि फूट-फूटकर रो पड़ी।
"तूने मुझसे छुपाया? मैं तेरी बीवी हूँ आरव! मैं तेरे साथ हर दर्द सह सकती हूँ! क्यों छुपाया?!" "इसलिए छुपाया... क्योंकि मैं डर गया था... कि कहीं तू मुझे छोड़कर न चली जाए। जब मैं कमजोर हो जाऊँ... जब मैं बाल खो दूँ... जब मैं बिस्तर पर पड़ा रहूँ... तब तू थक न जाए।" उस रात दोनों ने बहुत रोया।
एक-दूसरे को गले लगाकर।
फिर फैसला किया – हर पल को आखिरी समझकर जिएंगे।
हर हँसी को दोगुना करेंगे।
हर चुंबन को अमर बनाएंगे। इलाज शुरू हुआ।
कीमोथेरेपी के सेशन।
रेडिएशन।
दर्द की गोलियाँ।
उल्टियाँ।
बाल झड़ गए।
चेहरे पर पीले धब्बे।
वजन २० किलो कम हो गया। फिर भी आरव मुस्कुराता रहा।
"देख अंज... मैं अभी भी हैंडसम हूँ न? बस थोड़ा सा... एक्स्ट्रा स्पेशल हो गया हूँ।" अंजलि हँसती... लेकिन रात को तकिए में मुँह छुपाकर रोती।
"भगवान... उसे मत ले जाना... मैं बिना उसके नहीं जी सकती..." एक शाम आरव ने कहा –
"अगर मैं चला गया... तो तू दूसरी शादी मत करना।
मैं जलन से मर जाऊँगा... स्वर्ग में भी।" अंजलि ने गुस्से में कहा – "चुप कर! तू कहीं नहीं जाएगा! मैं तुझे जाने नहीं दूँगी! कभी नहीं!" डॉक्टरों ने कहा – "अब सिर्फ़ चमत्कार ही बचा सकता है।" फिर वो रात आई।
वो रात जब आरव ने कॉल किया – "मैं मर रहा हूँ..." अंजलि अस्पताल पहुंची।
आरव ICU में था।
डॉक्टर ने कहा – "पल्स बहुत कम है। परिवार को बुला लें। आखिरी समय है।" अंजलि अंदर गई।
आरव की आँखें बंद।
ऑक्सीजन मास्क।
मॉनिटर पर बीप की आवाज़ धीमी। वो उसका हाथ थामकर रोने लगी।
"आरव... उठ ना... प्लीज़... मैं बिना तेरे नहीं जी सकती... तूने वादा किया था... हम साथ रहेंगे... हमेशा..." तभी आरव की आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
बहुत कमजोर मुस्कान।
"अंज... मैं... झूठ बोल रहा था..." अंजलि स्तब्ध।
"क्या?" "मैं... मर नहीं रहा था... ये सब... एक टेस्ट था... मैं देखना चाहता था... कि मौत के नाम पर भी तू मेरे पास आएगी... या नहीं।
डॉक्टर ने कहा था कि मैं ठीक हो जाऊँगा... लेकिन मैंने तुझे बताया नहीं... क्योंकि मैं डर गया था... कि कहीं तू थक न जाए... मेरे दर्द से... मेरी कमजोरी से..." अंजलि का चेहरा सफेद पड़ गया।
गुस्सा। दुख। राहत। प्यार। सब एक साथ उमड़ आया।
उसने आरव का गाल थप्पड़ मार दिया – जोर से। "तू... तूने मेरे साथ ऐसा किया? मैं रात भर रोती रही... मैंने सोचा तू सच में जा रहा है! मैंने अपनी जिंदगी खत्म समझ ली! तूने मेरे साथ क्रूरता की!" आरव रो पड़ा।
"माफ कर दे अंज... मैं पागल हो गया था... डर गया था... कि कहीं तू मुझे छोड़कर न चली जाए... जब मैं कमजोर हो जाऊँ... इसलिए मैंने ये क्रूर नाटक रचा... ताकि मैं जान सकूँ कि तेरा प्यार कितना गहरा है... कितना सच्चा है..." अंजलि चुप रही।
फिर धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरा।
"पागल... मैं तुझसे कभी नहीं जाती... चाहे तू कितना भी बीमार हो... चाहे तू कितना भी बुरा कर ले... तू मेरा है... और मैं तेरी... हमेशा।" दोनों रोए।
बहुत देर तक गले लगे रहे।
आरव ने कमजोर हाथों से उसे सहलाया।
"तू मेरी जिंदगी है अंज... बस तू रहना... मैं ठीक हो जाऊँगा... वादा है..." लेकिन किस्मत ने फिर से करवट ली। तीन महीने बाद।
ट्यूमर ने फिर से सिर उठाया।
इस बार ज्यादा आक्रामक।
डॉक्टरों ने कहा – "अब कुछ नहीं हो सकता। कुछ हफ्ते... या दिन।" अंजलि टूट गई।
लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया।
वो हर पल उसके साथ रही।
उसके सिर पर हाथ फेरती।
उसके लिए पुराने गाने गाती – "तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी... हैरान हूँ मैं..."
उसके हाथ में हाथ डाले रोती।
रात को उसके कंधे पर सिर रखकर सोती। "आरव... तू ठीक हो जाएगा... देखना... हम फिर से राजपथ पर सैर करेंगे... फिर से कॉफी पीएंगे... फिर से..." आरव मुस्कुराता – बहुत कमजोर।
"हाँ अंज... हम करेंगे... वादा..." आखिरी रात।
आरव की सांसें बहुत धीमी हो चुकी थीं।
वो बोला – बहुत मुश्किल से –
"अंज... वादा कर... मेरे जाने के बाद... तू जीएगी... मेरे लिए नहीं... अपने लिए।
तू हँसेगी... तू घूमेगी... तू प्यार करेगी... फिर से।
मेरी याद में मत मरना... मेरी याद में जीना..." अंजलि रोते हुए बोली – "नहीं... मैं तेरे बिना नहीं जी सकती... तू मेरा सब कुछ है... प्लीज़... मत जाओ..." आरव ने आखिरी बार मुस्कुराकर कहा –
"तू मेरी सबसे बड़ी ताकत थी... अब मेरी याद बनकर ताकत बन जाना... प्लीज़... मेरे लिए... वादा कर..." फिर उसकी आँखें बंद हो गईं।
मॉनिटर पर लाइन सीधी।
बीप की आवाज़ रुक गई। अंजलि चीख पड़ी।
"नहीं! आरव! मत जाओ! प्लीज़! उठ ना! आरव!!" नर्सें आईं।
डॉक्टर ने उसे बाहर ले जाया।
अंजलि फर्श पर गिर पड़ी।
दुनिया उसके लिए खत्म हो चुकी थी। एक साल बाद।
वही पुरानी लाइब्रेरी।
वही किताब – "गुनाहों का देवता"।
अंजलि अकेली बैठी है।
उसकी उँगली पन्नों पर है।
आँखें नम। वो धीरे से बुदबुदाती है –
"आरव... तूने कहा था... अंत खुश नहीं होता... लेकिन तूने मेरी जिंदगी का अंत भी खुश नहीं होने दिया... फिर भी... मैं जी रही हूँ... तेरे वादे के साथ..." फिर वो मुस्कुराई – हल्की सी, दर्द भरी मुस्कान।
किताब बंद की।
उठी।
बाहर बारिश हो रही थी – ठीक वैसे ही जैसे उस दिन जब वो पहली बार मिले थे। वो बाहर निकली।
बारिश में भीगने लगी।
और हल्के से बोली –
"आरव... मैं जी रही हूँ... तेरे वादे के साथ... हर सांस में तू है... हर दर्द में तू है... हर खुशी में तू है... और रहेगा... हमेशा।" कभी-कभी प्यार मौत को हरा नहीं देता...
लेकिन वो मौत के बाद भी जिंदा रहता है।
किसी की यादों में।
किसी की आंसुओं में।
किसी की हर सांस में।
और कभी-कभी... वो प्यार इतना मजबूत होता है कि मौत भी उसे छीन नहीं पाती।
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