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कहानी: दिल से दिल तक

"मुझे समझ नहीं आता शिखा, तू ये फालतू की मन्नत मांगती ही क्यों है उस अनजान लड़के के लिए? कौन है वो तेरा? ना तेरा कोई रिश्तेदार है, ना तेरा कोई खून का रिश्ता। बस एक एनजीओ के ज़रिए तू उसकी पढ़ाई का खर्च उठाती है। और चलो, मन्नत मांगनी भी है तो कोई आसान सा मंदिर नहीं मिलता तुझे? इस पहाड़ की 150 खड़ी सीढ़ियां चढ़ कर जाना ज़रूरी है क्या? मंदिर तो मंदिर है, भगवान तो भगवान हैं, कॉलोनी के किसी भी मंदिर में चली जा।" राधिका ने पसीने से अपना माथा पोंछते हुए झुंझलाकर कहा।
शिखा ने अपनी सैंडल उतारकर एक किनारे रखी और नंगे पैर उन तपती हुई सीढ़ियों पर रखते हुए बहुत ही शांत और गहरे स्वर में कहा, "भगवान तो वही हैं राधिका, पर मेरी तपस्या तो इन 150 सीढ़ियों को नंगे पैर चढ़ने में ही है। जब तक पैरों में दर्द नहीं होता, लगता ही नहीं कि मेरी पुकार उन तक पहुँचेगी।"
राधिका ने अपनी पानी की बोतल निकालते हुए मुँह बनाया। उसके लिए शिखा का यह पागलपन समझ से परे था। "चल तू जा, क्या करेगी अकेली बैठी-बैठी? मैं भी चलती हूँ तेरे पीछे-पीछे," राधिका ने मजबूरी में कहा। "पर याद रख, मैं तेरी तरह कोई महान पुजारिन नहीं हूँ। मेरी फरियाद तो भगवान नॉर्मल मंदिर में भी सुन लेते हैं। इन 150 सीढ़ियों पर चढ़ कर अपने पैरों की ऐसी-तैसी नहीं करानी मुझे। मैं जूते पहन कर ही आऊंगी।"
मई की चिलचिलाती धूप थी। पत्थर की वो पुरानी सीढ़ियां आग की तरह तप रही थीं। शिखा बिना उफ किए, नंगे पैर उन सीढ़ियों पर चढ़ने लगी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसा दर्द तैर रहा था जिसे राधिका आज तक पढ़ नहीं पाई थी। जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ रही थीं, शिखा के पैरों के तलवे लाल हो गए थे, कुछ जगह से छिल भी गए थे, लेकिन उसके कदमों की रफ्तार कम नहीं हुई। राधिका जूते पहनने के बावजूद हांफने लगी थी। उसे शिखा पर गुस्सा भी आ रहा था और तरस भी। वह बार-बार सोच रही थी कि आखिर 'कबीर' नाम के उस बारह साल के अनाथ लड़के के लिए शिखा अपनी जान क्यों दे रही है, जिसे उसने सिर्फ एक एनजीओ में देखा था। 
पंद्रह मिनट की उस कठिन चढ़ाई के बाद दोनों पहाड़ की चोटी पर बने उस प्राचीन शिव मंदिर में पहुँचीं। शिखा के पैरों से हल्का-हल्का खून रिसने लगा था, लेकिन उसे जैसे अपने शरीर का कोई होश ही नहीं था। वह सीधा मंदिर के गर्भगृह के सामने गई और ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपने दोनों हाथ जोड़े और उसकी आँखें बंद हो गईं। 
कुछ ही पलों में शिखा के चेहरे का वो शांत आवरण टूट गया। उसकी बंद आँखों से आंसुओं का एक सैलाब फूट पड़ा। वह सिसक-सिसक कर रोने लगी। "मेरे कबीर को बचा लीजिए भगवान... उसका ऑपरेशन सफल हो जाए। मेरे हिस्से की सारी उम्र उसे लग जाए, पर उसे कुछ मत होने देना," शिखा ने कांपती हुई आवाज़ में प्रार्थना की।
पीछे खड़ी राधिका यह सब देख कर अवाक रह गई। उसने शिखा को कभी इस तरह टूटते और फूट-फूट कर रोते नहीं देखा था। राधिका का दिल पसीज गया। वह आगे बढ़ी और उसने शिखा के कंधे पर हाथ रखा। 
"शिखा... क्या हुआ तुझे? तू ऐसे क्यों रो रही है जैसे... जैसे तूने अपनी जान दांव पर लगा दी हो? माना तू बहुत अच्छी इंसान है, उस अनाथ बच्चे को पढ़ाती है, पर एक अजनबी के लिए इतना दर्द? तूने अपने पैर लहूलुहान कर लिए?" राधिका की आवाज़ में अब झुंझलाहट नहीं, बल्कि एक गहरी चिंता थी।
शिखा ने अपनी भीगी पलकें खोलीं। उसने राधिका की तरफ देखा। उसकी आँखों में आज वो सच तैर रहा था, जिसे उसने पिछले दस सालों से अपने सीने में दफन कर रखा था। 
"वो कोई अनाथ या अजनबी नहीं है राधिका," शिखा की आवाज़ एक ठंडी आह के साथ निकली। "कबीर... मेरी कोख का सच है। वो मेरा सगा बेटा है।"
राधिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या? तेरा बेटा? पर तूने तो कहा था कि शादी के दो साल बाद ही तेरे पति का देहांत हो गया था और तू अकेली रह गई थी।"
शिखा ने एक कड़वी मुस्कान के साथ अपने आंसू पोंछे। "हाँ, मेरे पति का देहांत हो गया था। लेकिन मेरे ससुराल वालों ने उस मौत का जिम्मेदार मुझे ठहराया। मुझे डायन कहा गया। जब कबीर सिर्फ दो साल का था, तब एक रात मुझे बुरी तरह पीटा गया और घर से बाहर निकाल दिया गया। मैंने पुलिस के दरवाज़े खटखटाए, बहुत मिन्नतें कीं, लेकिन वो लोग बहुत रसूखदार थे। उन्होंने कबीर को मुझसे छीन लिया। मेरी कोई हैसियत नहीं थी कि मैं उनसे लड़ सकूं। उन्होंने कबीर को बताया कि उसकी माँ मर चुकी है। कुछ सालों बाद जब मैंने खुद को पैरों पर खड़ा किया और उन्हें ढूंढते हुए गई, तो पता चला कि मेरे ससुर के देहांत के बाद मेरे जेठ ने कबीर को एक बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया था और खुद विदेश चले गए थे। वो लोग कबीर को अनाथों की तरह बड़ा कर रहे थे।"
राधिका सन्न होकर सुन रही थी। उसकी आँखों से भी आंसू बहने लगे थे। 
"मैं कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटकर उस बच्चे का जीवन और खराब नहीं करना चाहती थी," शिखा ने अपनी बात जारी रखी। "मैंने चुपचाप उस स्कूल के एनजीओ के ज़रिए उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी उठा ली। कबीर मुझे सिर्फ 'शिखा आंटी' समझता है। उसे नहीं पता कि जिस औरत के गले लगकर वो मुस्कुराता है, वो उसकी बदनसीब माँ है। आज सुबह अस्पताल से फोन आया था कि कबीर के दिल में एक छेद है और आज उसका एक बहुत बड़ा ऑपरेशन है। मैं उसके पास अस्पताल में माँ बनकर नहीं जा सकती राधिका... मेरे पास बस ये भगवान हैं और ये सीढ़ियां हैं। इन सीढ़ियों का दर्द मुझे मेरे दिल के दर्द को सहने की ताकत देता है।"
यह सुनकर राधिका के सीने में जैसे कोई खंजर उतर गया। जिस औरत को वह कुछ देर पहले तक फालतू की मन्नतें मांगने वाली समझ रही थी, वह दरअसल ममता की एक ऐसी मूरत थी, जो अपने ही खून के लिए दुनिया से छुपकर तपस्या कर रही थी। 
राधिका ने बिना एक पल सोचे शिखा को अपने गले से लगा लिया और खुद भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। "मुझे माफ़ कर दे शिखा... मैं कितनी अंधी थी। मुझे नहीं पता था कि तेरी इस 150 सीढ़ियों की तपस्या के पीछे एक माँ की इतनी बड़ी चीख छुपी है। तेरा कबीर बिल्कुल ठीक हो जाएगा। भगवान को तेरी तपस्या देखनी ही पड़ेगी।"
उस दिन मंदिर के प्रांगण में कोई सहेलियां नहीं थीं, बस एक टूटी हुई माँ थी और एक ऐसा अहसास था जिसने बिना खून के रिश्ते के भी ममता की गहराई को साबित कर दिया था। कुछ घंटों बाद शिखा के फोन पर मैसेज आया—"ऑपरेशन सफल रहा। कबीर खतरे से बाहर है।" शिखा ने भगवान की मूर्ति के सामने अपना सिर टेक दिया, और इस बार उसके आंसू सुकून के थे।