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गाजीपुर: साज-श्रृंगार व नाटकीय अंदाज, वाह भाई वाह

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गाजीपुर, खानपुर गोपालपुर गांव के राममंदिर परिसर में होने वाली रामलीला अन्य जगहों से अलहदा है। साज-श्रृंगार व नाटकीय अंदाज के लिए मशहूर इस लीला की खासियत तमाम है। देश की आजादी के समय उपहार में मिले 75 वर्षीय पुराने हनुमान जी के पीतल के ताज मुकुट से अब भी रामलीला की शुरुआत जहां लोगों को अब भी जोड़ती है पुरानी परंपराओं से वहीं सैकड़ों वर्ष पूर्व हस्तलिखित तमाम लिपियां इसकी सार्वभौकिता को समृद्धि प्रदान करता है। गांव के पुरुष कलाकारों द्वारा ही सभी चरित्र निभाया जाता है। पात्रों के संवाद में कवित्त सवैया चौपाई सोरठा और दोहों का इस्तेमाल अवधी भोजपुरी और हिदी भाषा में किया जाता है। गीत-संगीत के लिए पुरुष नर्तकियों से नाच कराया जाता है।

गोपालपुर में 148 वर्ष पूर्व काशी राजघराने की प्रेरणा से रामलीला का आयोजन शुरू हुआ। बनारस के तत्कालीन राजा प्रियानंद महाराज के निर्देश पर गांव के स्व. श्रीराम सिंह, स्व. रंति सेठ ने गांव में रामलीला का मंचन शुरू किया था। श्रीराम ललित कला परिषद की शुरुआत बांस की बनी सूप को रंगकर मुकुट बनाया जाता था। लाल गमछे से देवताओं का पोशाक बनाकर शुरू किया गया। खल चरित्रों के लिए पत्तों व काले कपड़ों का उपयोग किया जाता था। अंतरजातीय रामलीला का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए परिषद के लोग आज भी सभी जाति के बालकों को राम लक्ष्मण सहित अन्य पात्रों का चरित्र निभाने को महत्व देते हैं। रामलीला के दौरान पूरे गांव में उत्सव का माहौल रहता है। किसी न किसी रूप में सभी लोग रामलीला में अपनी भागीदारी निभाते हैं। वर्तमान में श्यामलाल सेठ, शमशेर सिंह, कृष्णानंद श्रीवास्तव, जसवंत सिंह व आशीष वर्मा द्वारा संचालित रामलीला में सबसे ज्यादा आकर्षण धनुष यज्ञ के बाद रामसीता विवाह का होता है जिसमें सभी गांव की महिलाएं व पुरुष विवाह मंडप में सम्मिलित होते हैं। राम सीता विवाह में सभी औरतें शामिल होकर मंगलगीत गाते हुए उपहार देकर नवविवाहित जोड़ें की बलैया लेते हैं।

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