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कहानी: तेरहवीं

विभा दिनभर दुकान पर रहतीं और अस्वस्थ कुमार साहब की सेवाटहल भी करतीं, लेकिन अचानक क्या हुआ कि उनके रंगीन सपनों का महल खड़ा होने से पहले ही जमींदोज हो गया?

तपन आज दुकान पर ही जाना चाहता था. अब बच्चों के स्कूल खुल गए थे और उसे विश्वास था कि इस वक्त उन की दुकान में इतनी बिक्री होगी कि 2 महीने का बैंक लोन वह आसानी से चुकता कर सकेगा. बैंक वालों ने कई बार तकाजा तो किया ही था, साथ ही इस बार चेतावनी भी दी थी कि अगर किस्त समय पर नहीं भरी तो वे दुकान पर ताला लगा देंगे. कुमार की पत्नी विभा तो इस बात से डर गई थीं, क्योंकि यह दुकान ही उन के भरणपोषण का एकमात्र जरिया थी, इसलिए तो वे दुकान को तीसरा बेटा मानती थीं.


तपन ने वकीलों की तरह जिरह करना शुरू कर दिया था कि मां ने लोन की किस्त भरने के लिए बैंक जाने को क्यों कहा, ‘‘लेकिन मां, ये पैसे तो दुकान का सामान लाने के लिए रखे थे न, अगर सामान नहीं आया तो हम बेचेंगे क्या?’’ ‘‘बेटा, यदि दुकान ही नहीं रही तो हम सामान का क्या करेंगे. अभी जो सामान दुकान में है उस की बिक्री से घर का खर्च चल जाएगा और दुकान में सामान भी आ जाएगा,’’ तपन को किसी तरह समझाबुझा कर मां ने लोन की किस्त भरने उसे बैंक भेज दिया और खुद किचन में चली गई. किचन का काम जल्दीजल्दी निबटा कर उन्हें दुकान पर भी जाना था. इधर कुमार साहब की तबीयत भी ठीक नहीं है. कई दिन से खांसी हो रही है, नहीं तो दोचार घंटे वे भी दुकान पर बैठ जाते.


तपन की वकालत की पढ़ाई के 6 महीने ही बाकी हैं. एक बार वह अच्छे नंबरों से पास हो गया और किसी कौरपोरेट औफिस में लग गया तो उन के सारे दुखदर्द हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे. बड़े बेटे से तो कोई आशा थी नहीं. विवाह के बाद से वह घर से अलग ही रहता था. सारी आशा उन की तपन पर ही टिकी थी. इसलिए उन्होंने सोच रखा था कि तपन जब अपने पांव पर खड़ा हो जाएगा, तभी वे उस की शादी करेंगी. कोई पूछता भी कि आप के कितने बेटे हैं तो विभा बडे़ अजीबोगरीब ढंग से कहतीं कि एक तो यह तपन है और दूसरी यह दुकान है जो हमें कमा कर खिला रही है. यदि कोई भूलेभटके बड़े बेटे के बारे में पूछता तो वे तीखी नजरों से सामने वाले को भेदती हुई कहतीं कि जले पर नमक छिड़कना तो कोई आप से सीखे. आप को सब मालूम ही है, फिर उस से ही जा कर क्यों नहीं पूछते?


कुमार की पत्नी विभा ने बड़े बेटे की तसवीर तक उठा कर अटैची में रख दी थी. उस से अब कोई नाता ही नहीं था. किचन से बाहर आ कर तौलिए से हाथ पोंछती हुई विभा सोच रही थीं कि यह दिमाग भी हर समय चलता ही रहता है. अगर इंसान भी बिना पैसे लगाए दिमाग की तरह घूमघाम आता तो कितना अच्छा होता. रातदिन की झिकझिक से छुटकारा मिल जाता. फिर वे खुद पर हंसीं. कलाई घड़ी में देखा तो 10 बजने को थे. उन्हें देर हो रही थी. तपन भी बैंक से सीधे दुकान पर ही पहुंचेगा. उन्हें निकलना चाहिए. वे चप्पल पहन कर दुकान पर जाने के लिए निकल ही रही थीं कि अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी. किस का फोन हो सकता है, इस समय. क्या तपन ने बैंक में किसी से कोई मारपीट तो नहीं कर ली. यह लड़का भी न अजीब है, सोचता कुछ है और करता कुछ है. आज भी तपन के घर से निकलने से पहले उन्होंने कहा था, ‘‘तपन, खाली पेट घर से नहीं जाते, कुछ खा कर जाओ,’’ वह कितने दिन से कह रहा था, ‘मां, मछली बनाओ,’ लेकिन  पैसे की कमी से वे बना नहीं पा रही थीं. आज किसी तरह महीने के खर्चे में से पैसे बचा कर मछली बनाई थी तो बिना खाए ही चला गया.


खाली पेट दिमाग भी गरम होता है. तपन ने मां से कहा था, ‘‘मैं आप को बैंक की रसीद दे कर घर वापस आऊंगा तो फिर खा लूंगा.’’ तपन ने कुछ खायापीया नहीं है, बैंक वाले से तूतूमैंमैं हो गई होगी. यह लड़का भी न. अभी वे घर से निकलना ही चाहती थीं कि फिर से मोबाइल की घंटी बज उठी.


बिना कुछ पूछे उन्होंने झुंझला कर फोन पर कहा, ‘‘अब क्या हुआ तपन?’’


दूसरी तरफ से मर्दानी आवाज थी, ‘‘विभा… विभा…’’


‘‘हां, मैं विभा ही बोल रही हूं, क्या बात है?’’


उस की बात सुने ही उन्होंने पूछ लिया, ‘‘विभाजी, आप का बेटा…’’


‘‘क्या हुआ, तपन ने पैसे तो जमा कर दिए न, अगले महीने हम अगली किस्त दे देंगे.’’


सामने से फिर आवाज आई, ‘‘मैडम, मैं इंस्पैक्टर रवि बोल रहा हूं.’’


‘इंस्पैक्टर रवि,’ वे खुद से बुदबुदाईं. तपन तो मारधाड़ करने वाला लड़का नहीं है, फिर यह इंस्पैक्टर क्यों?


‘‘मैडम, आप सुन रही हैं न, आप फौरन यहां हाईवे पर आ जाइए. आप के बेटे तपन का ऐक्सिडैंट हो गया है.’’


‘‘क्या,’’ उन्हें जैसे करंट सा लगा. यह कैसे हो सकता है. जिस सिरे को पकड़ कर वह इतना बड़ा तानाबाना बुन रही हैं, वह अचानक उन के हाथ से छूट कैसे सकता है?


वे घबराहट में बोलीं, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? आप को जरूर कोई गलतफहमी हुई है. मेरा बेटा तो बैंक गया है.’’


‘‘मैडम, आप को जो भी सवाल पूछना है, वह यहां आ कर पूछिए, हमें और भी फौर्मेलिटीज पूरी करनी हैं,’’ कह कर इंस्पैक्टर ने फोन रख दिया.


उन्होंने 2-3 बार फिर फोन ट्राई किया, लेकिन कोई जवाब न मिलने से तपन के बाबा को ले कर वे किसी तरह दुर्घटनास्थल पर पहुंचीं. वहां 2-3 पुलिस वाले और कुछ लोग मौजूद थे. खून के कुछ धब्बे सड़क पर सूख गए थे. पुलिस के पास जा कर उन्होंने पूछताछ की तो पुलिस वालों ने बैंक की रसीद, कुछ कागजात, उस का आईडी कार्ड निकाल कर उन्हें देते हुए बताया कि तपन को सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया है.


तपन अब कभी नहीं आएगा, मैं अस्पताल की सारी कार्यवाही पूरी कर के आता हूं. पुलिस वालों को भी जवाब देना है.

अस्पताल पहुंचने से पहले ही उन्होंने बड़े बेटे को फोन किया और पूरी घटना की जानकारी दी. अस्पताल पहुंच कर बड़ी मुश्किल से वे तपन को देख पाए. उस के सिर में चोट लगी थी, जिस के कारण उसे आईसीयू में रखा गया था. अस्पताल में बैंच पर बैठी वे डाक्टर का इंतजार करती रहीं. विभा मन ही मन कुढ़ रही थीं कि यह सब उन्हीं की गलती है. न वे उसे बैंक भेजतीं न उस का ऐक्सिडैंट होता. वह तो दुकान पर ही जाना चाहता था. उस ने तो कुछ भी नहीं खाया. कैसी मां हूं मैं. खुद ही बेटे को मौत के मुंह में धकेल दिया. पर उन्होंने ऐसा कहां सोचा था कि तपन के साथ ऐसी दुर्घटना होगी. पास खड़े कौंस्टेबल ने भी बड़ी आत्मीयता से कहा, ‘‘बाई, घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा.’’ एक घंटा ऐसे ही बीत गया, तब तक बड़ा बेटा भी वहां आ गया था. उन्होंने रुकरुक कर उसे सारी बातें बताईं. उस ने दिलासा देते हुए कहा कि वह डाक्टर से मिल कर आता है. थोड़ी ही देर में बड़ा बेटा निराश सा चेहरा लिए बाहर आ गया.


‘‘मां, तुम बाबा को ले कर घर जाओ.’’


‘‘लेकिन तपन कैसा है? यह तो बताओ. रात को रुकना पड़ेगा तो मैं घर का काम खत्म कर के आती हूं.’’


‘‘मां, तपन अब कभी नहीं आएगा, मैं अस्पताल की सारी कार्यवाही पूरी कर के आता हूं. पुलिस वालों को भी जवाब देना है. सिर में गहरी चोट लगने से उस की मृत्यु हो गई है.’’ उन्होंने एक बार कौंस्टेबल की ओर देखा और धम से बैंच पर बैठ गईं. किसी तरह बड़े बेटे ने दोनों को रिकशे में बैठा कर घर भेज दिया. पूरे कौंप्लैक्स में यह खबर आग की तरह फैल गई थी. कारण यह भी था कि पूरे कौंप्लैक्स में यह एक अकेली जेरौक्स और स्टेशनरी की दुकान थी. नए फ्लैट खरीदने या किराए पर लेने हेतु एग्रीमैंट बनवाने के लिए इसी दुकान पर जाना पड़ता था. सब अपनीअपनी अटकलें लगा रहे थे, पर सब की एकमत राय यही थी कि अब यह दुकान तेरहवीं के बाद ही खुलेगी. बिना तेरहवीं के कोई मांबाप कैसे दुकान खोल सकते हैं. वह भी जब जवान बेटा मरा हो. भला उस की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी?


कई लोगों ने शाम को उस के घर जा कर सांत्वना प्रकट करने की पूरी तैयारी भी कर ली. वहां पर क्या बोलना है मन ही मन उन्होंने इस की प्रैक्टिस भी कर ली. कुछ लोग पोस्टमार्टम के बाद डेडबौडी घर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. आसपड़ोस के लोगों और नातेरिश्तेदारों से उन का घर भरा हुआ था. कुछ महिलाओं ने अपने अनुभवों का खजाना खोलते हुए एकदूसरे को इशारे से देखते हुए कहा, ‘‘रो नहीं रही हैं. रोना तो जरूरी है, नहीं तो हार्ट अटैक हो सकता है.’’ एक पुरुष जो दिन में ही दारू चढ़ा लेता था और आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए हुए बड़े संवेदनशील स्वर में बोले जा रहा था, ‘‘अब होनी को कौन टाल सकता है, विभाजी, जब राम और कृष्ण इसे नहीं टाल सके तो इंसान की क्या बिसात. तुलसीदासजी तो एक ही लाइन में जीवन का सार समझा गए, ‘हानिलाभ, जीवनमरण, यशअपयश, विधि हाथ.’ ये सब तो उन के ही हाथ में है. हम इंसानों की क्या बिसात है. ‘‘मैं कालोनी वालों की तरफ से आप को आश्वासन दिलाता हूं कि तेरहवीं तक सब आप के आने का इंतजार करेंगे. तब तक कोई भी कहीं से जेरौक्स नहीं करवाएगा.’’


उस के इस जुमले से कई लोग आगबबूला हो गए, बड़ा नेता बनता है. एक रुपए के जेरौक्स में 75 पैसे ही देगा, बाकी पैसा मार लेगा और खुद कौंप्लैक्स वालों का ठेका ले कर घूम रहा है. अरे, किसी को इमरजैंसी होगी तो क्या 13 दिन तक वह इंतजार करता रहेगा. कई लोगों की तनी भृकुटी देख कर वह अपना काला चश्मा चढ़ा कर वहां से खिसक गया. विभा इस सारी बातचीत से उदासीन अपने खयालों में गुम थीं. कैसे तपन उन के पतलेदुबले शरीर को अपनी मजबूत बांहों में उठा कर घुमाते हुए कहता था, ‘मां, थोड़ा खापी कर तंदुरुस्त बनो, अन्यथा सास बनने का बोझ कैसे उठाओगी. तुम्हारी बहू तो तुम से डरेगी भी नहीं. इसीलिए तो भाभी तुम्हें छोड़ कर चली गईं. तुम हुक्म चलाने लायक मजबूत थी ही नहीं.’


‘हां, और तेरी बहू भी बात नहीं मानेगी न,’ वे हंसते हुए कहतीं.


‘कैसे नहीं मानेगी,’ उन्हें सोफे पर बैठाते हुए तपन कहता, ‘कुछ दिन की बात है मां, मेरी पढ़ाई पूरी होने दो. मैं ने विदेश में स्कौलरशिप के लिए अप्लाई कर दिया है. उम्मीद है, मिल ही जाएगी. उस के बाद अच्छी नौकरी मिल जाएगी, तब तुम्हें खिलापिला कर तंदुरुस्त बना दूंगा, फिर तुम दोनों जगह राज करना?’


‘दोनों जगह मतलब.’


‘दोनों जगह यानी दुकान पर और घर में, दुकान में एक आदमी रख लेना और घर में बहू रहेगी.’


‘फिर मैं दुकान क्यों जाऊंगी. उसे बंद कर दूंगी, रोजरोज की झिकझिक बंद…’


अचानक ही उस का चेहरा गंभीर हो जाता, ‘नहीं मां, इसे बंद मत करना, यह तुम्हारा तीसरा बेटा है. मैं विदेश जा कर अगर मेम ले आया या वहीं बस गया तो यह तुम्हारा तीसरा बेटा ही तो तुम्हारे काम आएगा.’


विभा उदास हो जातीं, ‘क्या तू भी भैया की तरह मुझे छोड़ कर चला जाएगा?’


‘नहीं मां,’ तपन हंसते हुए कहता, ‘तुम्हें लगता है मैं छोड़ कर चला जाऊंगा. बहुत दुख देखे हैं तुम ने. पापा की बीमारी, हमारी परवरिश, दुकान का रखरखाव सब के लिए तुम ने अपनी कभी परवा नहीं की. अब मैं तुम्हें देशविदेश घुमाऊंगा. तुम शहर से कभी बाहर नहीं गईं, मैं तुम्हें कोलकाता ले जाऊंगा. दुकान पर तब तक जिस आदमी को रखेंगे वह संभालेगा. तुम केवल महारानी की तरह उस से हिसाबकिताब मांगना और बहू के साथ शौपिंग करना.’


‘अच्छा, बहू की तरफदारी करता है. वह काम नहीं करेगी, केवल शौपिंग करेगी.’


कुमार साहब, मांबेटे की चुहल देखते हुए कहते, ‘क्या खुसुरफुसुर हो रही है मांबेटे के बीच.’


‘हां, आप की शिकायत हो रही है. बेटा तो मेरा है न.’


विभा की नजर आकाश की तरफ उठ गई. ‘कहां हो बेटा, तुम तो विदेश जाने वाले थे, यह कहां चले गए. विदेश रहते तो कभीकभार बात भी कर लेती.

‘हां भई, तुम्हारा ही है,’ कुमार साहब हंसते हुए कहते, ‘पर मुझे कंधा तो वही देगा न, बाप हूं मैं उस का. एक ने तो पहले ही किनारा कर लिया, अब इस का ही आसरा है.’


सोचतेसोचते विभा की नजर अचानक कुमार साहब की तरफ गई जो अरथी को रस्सी बांध रहे थे. वे सोचने लगीं, ‘कहां तो ये बेटे के कंधे का सहारा ले कर जाने वाले थे और कहां आज बेटे को कंधा देना पड़ रहा है.’


विभा की नजर आकाश की तरफ उठ गई. ‘कहां हो बेटा, तुम तो विदेश जाने वाले थे, यह कहां चले गए. विदेश रहते तो कभीकभार बात भी कर लेती. अब मैं कहां देखूंगी तुम्हारा चेहरा.’ जिस शरीर को बचपन में रूई के गद्दे पर सुलाया करती थी कि कहीं उस के नाजुक शरीर पर उंगलियों के निशान न पड़ जाएं, उसे डाक्टर ने आज जाने कहांकहां नहीं चीराफाड़ा होगा. क्यों करते हैं लोग पोस्टमार्टम. क्या आत्मीय जनों की आत्मा का पोस्टमार्टम कम होता है, जो सरकार डेडबौडी का पोस्टमार्टम करवाने लगती है. अरे, एक बार रिश्तेदारों से पूछ तो लो कि उन्हें पोस्टमार्टम करवाना भी है या नहीं. कितनी चीरफाड़ करोगे हमारी जिंदगी की. विभा की आंखें आंसुओं से भर गईं.


अचानक हंगामा सा मच गया, ‘‘बौडी आ गई, बौडी…’’


आज सुबह ही तो तपन जीताजागता गया था और अब अचानक ही एक बौडी बन गया. दहाड़ें मार कर रो पड़ीं विभा, जैसे घर की दीवारों और छतों से पूछ रही हों कि कहां है मेरा तपन? वह बौडी कैसे बन सकता है? मैं जो उस में जीती हूं. धीरेधीरे भीड़ छंटने लगी थी. अरथी के साथ ही अधिकतर लोग चले गए थे. बड़ा बेटाबहू रात को आने का वादा कर के खिसक गए थे कि कहीं क्रियाकर्म में पैसा न खर्च करना पड़े. आज वर्षों बाद वे कुमार साहब के पास बैठीं बीती बातें कुरेद रही थीं. जब बच्चे बड़े होने लगे थे तब से उन की जिंदगी उन के ही इर्दगिर्द मंडराने लगी थी. आज तपन की एकएक चीज, उस के स्कूल के कपड़े, उस के फोटो, उस के जीते हुए कप, जूतेमोजे को सहेजसहेज कर रखते हुए उन्होंने रात बिता दी थी. सुबह थोड़ी सी उन की आंख लगी, तो लगा जैसे तपन कह रहा हो, ‘मां, तुम्हें मालूम है न, कितने लोगों के पैसे देने हैं.’ वे उठ कर बैठ गईं और सोचने लगीं, ‘दुकान बंद रहेगी तो रोज का खर्च कैसे चलेगा.’


रोज की तरह ही उन्होंने घर का काम निबटाया, कुमार साहब को समय पर दवा लेने के लिए कहा और कौंप्लैक्स के लोगों ने देखा कि 10 बजे जेरौक्स की दुकान खुली हुई थी. लोगों की आपस में खुसुरफुसुर चालू हो गई कि कैसी औरत है, धर्मकर्म से कोई वास्ता ही नहीं है. लगता है कि बेटे के मरने के दिन गिन रही थी, तभी तो एक दिन भी नहीं बीता कि दुकान पर आ कर बैठ गई. तेरहवीं भी नहीं की. बेटे की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी. ऐसे ही नास्तिक लोगों के कारण दुनिया रसातल में जा रही है. एक बुजुर्ग महिला ने विभा से पूछ ही लिया, ‘‘बहनजी पूछना तो नहीं चाहिए, सब की अपनीअपनी सोच है, पर आप लोग तेरहवीं नहीं करते क्या? आखिर मरने वाले की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी?’’ विभा ने जेरौक्स मशीन में कागज लगाते हुए कहा, ‘‘हम जैसे लोगों का मरना क्या और जीना क्या? हम तो रोज मरते हैं, रोज जीते हैं और हमारी तेरहवीं भी रोज होती है.’’


अब तक दुकान पर जेरौक्स निकलवाने, कौपीपैंसिल खरीदने वालों की लंबी लाइन लग गई थी. वे सारा काम फुरती से निबटाते हुए सोच रही थीं, ‘अगर ऐसी ही भीड़ रही तो वे जल्दी ही लोन चुकता कर किसी को दुकान पर काम करने के लिए रख लेंगी.’ फिर आकाश की ओर देख कर आंखें मूंद कर मन ही मन उन्होंने कहा, ‘यही तेरी तेरहवीं है बेटा. मैं ने दुकान बंद नहीं की. यह तीसरा बेटा है न मेरा.’

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