कहानी: मेरा हिस्सा
‘‘मां, पिताजी की डायरी कहां गई, मुझे कुछ देखना है. उन की अलमारी में रखी देखी थी.’’ आभा को अच्छी तरह याद था कि पिताजी के सामान के साथ ही उन की डायरी रखी थी. उस में ही तो उन्होंने अपने आखिरी दिनों के सारे मसले लिख रखे थे और अपनी वसीयत संबंधी जानकारी भी लिखी थी पर न जाने क्यों वह उन की अलमारी से गायब थी. मां से पूछने पर उन्होंने साफ इनकार कर दिया.
‘‘मुझे क्या पता, मैं ने तो तुम्हारे पिताजी से कभी किसी बात की कोई खबर ही नहीं ली. मुझे कहां पता है कि उन्होंने कहां क्या रखा है,’’ कह कर वह अपने काम में मशगूल हो गई तो किताबों के बीच आभा को वह डायरी छिपी हुई मिली मगर यह क्या, उस का वह पन्ना ही गायब था जो उस के लिए एक आधार बनता. दरअसल, यह सारा मसला इसलिए उलझ था कि पिताजी ने रिटायरमैंट के पैसों से बड़ा प्लौट लिया जिस में अपने रहने के लिए मकान बनाया और अपने प्लौट के बगल का प्लौट बेटी के नाम और आखिरी प्लौट बेटे के नाम कर दिया.
उस के नाम की जमीन पर छोटे भाई का मकान बन गया और उस में भाई सपरिवार रहने लगा. जब तक पिताजी जीवित रहे, किसी ने उस से कुछ न कहा. खून से इतर के रिश्ते शांति से कहां बैठते हैं. जब तब यह विषय उठता कि बड़ी दीदी के नाम की जमीन छोटे भाई के नाम पर हो जानी चाहिए.
पिता की मृत्यु के बाद मां आसानी से कह देतीं, ‘आभा को किस बात की कमी है जो मायके में आ कर बसेगी. मैं कह दूंगी तो वह जमीन छोटे के नाम कर देगी.’
बातचीत होतेहोते यह मामला संगीन होता गया. तो भाइयों ने आपस में विचारविमर्श किया और मां को जमीन के निबटारे के लिए आगे कर दिया.
मां तो मां होती है- बेटे की भी और बेटी की भी. अपने बुढ़ापे की चिंता करती हुई, घुमाफिरा कर आभा पर दबाव बनातीं ताकि वह अपनी जमीन भाई के नाम कर दे मगर अब आभा पहले की तरह मासूम न रह गई थी. कोरोना महामारी में पति को खोते ही जैसे अपनेबेगाने सब पहचान में आ गए थे.
सालों बाद जब मायके आई तो पिता की कही बातें याद आ गईं. जब कभी किसी विषय पर उलझन तो इस डायरी के पन्ने पलटना शायद तुम्हारे काम आ जाए. यही सोच कर डायरी ढूंढ़ रही थी पर उस के कुछ पन्ने फाड़े गए थे जिस के पीछे छोटे भाई की मंशा समझते उसे देर न लगी.
उसे बीते हुए एकएक पल याद आने लगे. कोरोना महामारी के समय कुछ सच तो कुछ अफवाह ने कैसे उस के पति के मन पर कुप्रभाव डाला था. शिवेंद्र पहले ही कुछ बीमार थे और कोरोना के माहौल में और भी बीमार होते चले गए. एक किस्म की घबराहट उन के मन के गहरे समा गई मानो यह संपूर्ण संसार नष्ट हो जाएगा जबकि आभा आशान्वित रहती कि सब ठीक हो जाएगा. मगर कहते हैं न, जन्म और मृत्यु तो पूर्वनिर्धारित हैं, उन की तिथि टल
नहीं सकती. कोरोना का डेल्टा वैरिएंट जिस ने मार्चअप्रैल 2021 में पूरी दुनिया में तबाही मचाई थी, उस ने शिवेंद्र को भी अपनी चपेट में ले लिया. आभा को
ऐसा लगा जैसे उस की दुनिया ही तबाह हो गई. पिता को खो कर भी वह
जीवनसाथी की हिम्मत पर संभल सकी थी मगर अब उस का वह संबल भी टूट चुका था.
कहते हैं, जब स्त्री सब से कमजोर होती है तो उसे जननी याद आती है. उस वक्त जब सामने पति का शरीर पड़ा था, वह रोतीबिलखती मां को फोन कर रही थी. मगर उस वक्त उस के आंसू पोंछने कोई नहीं आया. जिन भाइयों पर उसे हद से ज्यादा भरोसा था वे भी अपने घरों में दुबके थे. क्या मौत का डर ऐसा होता है. लोग इतने स्वार्थी हो जाते हैं. पति के मुख को निहारती वह सोचती रही कि कैसे उस ने अपने परिवार के हित में अपने पति को लगाए रखा और जब उस पर विपदा पड़ी तो किसी का कोई पता न था. उस के साथ सिर्फ वही लोग खड़े थे जो एकदूसरे के लिए मरमिटने को तैयार थे. वक्त चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो, मन मजबूत हो ही जाता है. आभा ने भी दिल पर पत्थर रख लिया और चुपचाप अपने बच्चों के साथ मिल कर अपने पति का आखिरी क्रियाकर्म किया. उस रोज पति के साथसाथ मायके को भी तिलांजलि दे दी थी.
आभा के पास उस के साथ कोई था तो उस के अपने बच्चे थे. मगर शिवेंद्रजी के साथ मिल कर जिन के लिए तमाम फर्ज निभाए थे वे सब के सब भुला दिए गए थे. दिल टूटा, मन रोया भी मगर फिर पिता की सिखाई बातों ने ही हौसला दिया और वह धीरेधीरे संभलने लगी. ऐसे में जब फिर से मां ने जमीन का मामला उठाया तो इस बार उस की दृढ़ता अलग थी.
‘‘तुम अपने हिस्से की जमीन भाई के नाम कर दो.’’
मां ने जब यह कहा तो उस से न रहा गया, बोली, ‘‘मेरे पिता की निशानी है. उन्होंने मेरे लिए खरीदी थी. मैं उस से अपना नाम नहीं हटा सकती.’’
‘‘इस से तुम्हें क्या हासिल होगा?’’
‘‘संतुष्टि मिलेगी. आप ने जब जो कहा, मैं ने किया. भाईबहन के काम आई.’’
‘‘वे भी तुम्हारे लिए एक पैर पर खड़े रहे.’’
‘‘जब तक बाबूजी थे, तभी तक. अब तो मुझ से कोई सीधे मुंह बात तक नहीं करता.’’
‘‘जितना किया, वह कम नहीं है. समयसमय पर तुम्हें आर्थिक मदद भी दी गई है जिस के बदले में यह जमीन तुम्हें वापस लौटानी होगी.’’
मां ने आदेशात्मक रवैया अपनाते हुए ओजपूर्ण आवाज में कहा तो आभा ने विरोध जताया, ‘‘माना आप ने मेरी मदद की है पर यह भी देखिए कि जो कुछ मैं ने किया है वह कोई जमीन नहीं कर सकती. बैंक में पड़े पैसे भी पूरी जिंदगी नहीं चलते. आज भाई जिस नौकरी की पैंशन उठा रहा है वह मेरे पति ने ही लगवाई थी.’’ आखिरकार जब आभा से न रहा गया तो सबकुछ कह डाला.
‘‘हां, मानती हूं तुम ने हमेशा संभाला है. बड़ी हो, बड़प्पन दिखाओ. बच्चे कुपात्र हों तो भी माता कुमाता नहीं होती.’’
‘‘मुझे मेरा हिस्सा दे दो.’’
‘‘मगर तुम घर का क्या करोगी. अब दामादजी हैं नहीं. अकेली जान कितना संभालोगी. तुम अपने बच्चों के साथ रह लो और यह घर भाई के नाम कर बड़ी बहन का फर्ज निभाओ.’’
मां ने ट्रंपकार्ड खेल दिया. जानती थी कि कुछ भी हो जाए, बिटिया पिता के आदर्शों की अनदेखी न कर पाएगी. पिता ने बचपन से यही तो किया था. जीतेजी सारे आदर्श उस में भर दिए थे. महापुरुषों की इतनी आत्मकथाएं और बंगाली उपन्यास पढ़ने के लिए दिए जिन में बड़ी बहनें त्याग के लिए ही बनी थीं. इन ब्राह्मणवादी लेखकों ने औरतों की दयनीय दशा तो दिखाई थी पर उन्हें हक दिलवाने में कोई पहल नहीं की थी. इन उपन्यासों के जरिए उन्होंने औरतों को सिखाया था कि त्याग ही बड़ी चीज है और पति व पिता, भाई ही औरत के मालिक हैं. आभा जानती थी कि आजादी के बाद के कानूनों ने औरतों को बराबर के हक दिए हैं. वह अब अपने लिए कुछ करना चाहती है.
जीवनकाल में उसे परिवार से दूर न होने दिया था बल्कि नौकरी से सेवानिवृत्त होने पर लड़कों के बीच ही बेटी के लिए भी जमीन खरीद ली थी. चाहते तो उस के लिए जमीन कहीं दूर भी खरीद सकते थे मगर उन की बड़ी बेटी उन की नजर में उन के बेटों की अभिभावक थी जो उन के बाद भी परिवार का ध्यान रखती. जमीन के बीचोंबीच बिटिया के नाम की जमीन थी.
‘‘मैं ने पहले कभी नहीं कहा कि मुझे मेरी जमीन वापस दो. मैं ने हमेशा सब का भला चाहा मगर जिस तरह काम निकालने के बाद तुम लोगों ने मुझे दूध से मक्खी सा निकाल फेंका है, मेरे साथ न्याय नहीं हुआ है.’’
‘‘पता नहीं क्या बोल रही हो, क्या हम ने तुम्हें यही शिक्षा दी थी?’’
‘‘त्यागमयी बड़ी बहन बनाया था मगर क्यों मां, क्या मुझे जनने में दर्द न हुआ था. क्या मैं अपने किसी फर्ज में चूकी हूं. मुझ में और तुम्हारे पुत्रों में ऐसा कौन सा फर्क है जो उन का हक मुझ से ज्यादा है,’’ बोलतेबोलते आभा की सांस फूलने लगी तो स्वर को विराम देते हुए कहा, ‘‘आज अगर मैं ने अपने अधिकार का त्याग किया तो कल को मेरी बेटी भी त्याग की मूर्ति बनेगी जो मुझे बरदाश्त नहीं होगा.’’ इतना कह कर वह अपने घर चली आई.
पूरी उम्र स्वाभिमान के साथ जीने वाली आभा को जमीन, जगह या मकान का कोई मोह न था बल्कि वह तो उस मिठास की दीवानी थी जो उस के अबोध भोलेभाले भाई की तोतली बोली में था. जिसे याद कर अब भी उस का कलेजा फटता था मगर भाई आगे बढ़ने की होड़ में अपनी स्नेही बहन को भूल चुके थे. भूल चुके थे कि जिस बहन ने गाहेबगाहे आशीर्वाद के साथ न केवल अनगिनत रुपए थमाए थे बल्कि अपना अगाध स्नेह लुटाया था जो उस जमीन से कहीं ज्यादा कीमती था. आज उस के एवज में उसे स्नेह व सम्मान की ही तो भूख थी. उस ने कुछ ज्यादा तो नहीं मांग लिया था.
हालांकि वह जानती थी कि एक नोटिस से बस एक ही नोटिस में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और आखिरकार वही हुआ जब वकील से सलाह ले कर नोटिस भेजा तो एक ही झटके में ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया था. जमीन के बदले जमीन की बात पर अदालत के बाहर ही पूरा मामला सुलट गया. मां ने बराबर माप की एक जमीन उसे बतौर तोहफा दी तो उस ने भी हस्ताक्षर कर अपनी जमीन का हस्तांतरण भाई के नाम कर दिया.
आभा ने मां से मिली जमीन पर एक 4 मंजिलों के मकान का निर्माण कराया जिस की पहली मंजिल पर लाइब्रेरी में वे समस्त उपन्यास सहेजे गए जो पिता ने किशोरी पुत्री को भेंट किए थे. माना कि पिता ने अपने युग के अनुसार अपनी पुत्री का लालनपालन किया था मगर पुत्री आज के युग के अनुसार चलने वाली शिक्षित महिला थी. उस ने सारे कानूनों की किताबों को भी जमा कर के रखवाया. पुस्तकालय खोल कर उसे सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी निभाते हुए अपनी माताजी समेत वहीं ऊपरी मंजिलों पर रहने लगी. जैसी उम्मीद थी, बगल में रहते भाई भूल कर भी उस के घर में झांकते नहीं थे. आभा के दिल में टीस तो उठती पर उस ने अब दिल को मजबूत बना लिया था.
