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कहानी: जमीर

काफी बहस के बाद ही अभय राजी हो पाए थे कि नीचे गैराज में बने कमरे को किराए पर दे दिया जाए. अभय कभी भी घर में किसी भी किराएदार को रखने के पक्ष में नहीं थे और जया अच्छी तरह जानती थी कि उन्हें इस बात के लिए राजी करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है. बहस तो पिछले 2 वर्षों से चल रही थी. जब से अभय ने अपना काम दूसरे शहर में भी लेना शुरू किया तब से उन के टूर प्रोग्राम बढ़ गए थे और जया को घर में अकेलापन लगने लगा था.
वैसे भी अभय के काम में उस का भी कुछ सहयोग रहता था पर बारबार अभय के साथ बाहर जाना भी मुश्किल होता जा रहा था. घर में चौकीदार रख कर जाओ तो वह भी समय से नहीं आता, नौकरानी बिंदिया यों तो पुरानी थी पर वह भी अकसर छुट्टी कर जाती. बाहर के गमले सूख जाते, छत पर धूल जमा हो जाती और फिर जया को भी बाहर जाने का शौक था. अभी तक तो बच्चों और घरगृहस्थी में ही उलझ रही. अब समय मिला है तो उस का भी लाभ उठा नहीं पा रही है. गाजियाबाद की इस कालोनी में किराएदार मिलना मुश्किल नहीं है लेकिन फैमिली वाले अच्छे लोगों को दिया जाए तो बेहतर होगा. बारबार जब दलीले दीं और यही सब समझाया तो आखिरकार अभय मान गए थे.

‘‘ठीक है, तुम जिसे सही समझा रख लो लेकिन अकेले छात्र को मैं कमरा हरगिज नहीं दूंगा. देख रही हो न, कितने हादसे हो रहे हैं गाजियाबाद में.’’

‘‘हां, वह तो मैं भी समझती हूं, मुझे किसी जिम्मेदार को ही रखना है जो घर को मेरी अनुपस्थिति में संभाल सके,’’ कुछ सोचते हुए जया ने जवाब दिया था.

आखिरकार उसे अधिक इंतजार करना भी नहीं पड़ा. बाहर दरवाजे पर तख्ती लगाते ही तीसरे दिन एक लड़की ने दरवाजे की घंटी बजाई थी.

जया ने खिड़की से झाका.

‘‘आंटी, क्या रूम खाली है?’’ वह लड़की पूछ रही थी. साधारण वेशभूषा में एक सांवली सी लड़की खड़ी थी.

‘‘हां, किसे चाहिए?’’

जया सोच रही थी कि अकेली लड़की को तो कमरा देना ही नहीं है तो यहीं से मना कर दिया जाए. पर वह लड़की खड़ी रही.

‘‘आंटी, मैं और मेरी मां रहेंगी.’’

‘‘अच्छा.’’

जया ने बाहर आ कर फाटक खोला, ‘‘क्या करती हो? कहां से हो?’’

‘‘आंटी, मैं राजस्थान के सांगोद से आई हूं. मैं ने 12वीं पास की है और यहां कोचिंग करूंगी. मेरी मां भी साथ रहेंगी तो क्या कमरे के साथ किचन भी है?’’

कमरा जया ने अभय से कह कर चौकीदार के लिए बनवाया था तो सारी सुविधाएं थीं लेकिन अभी भी वह कुछ हिचकिचा रही थी.

‘‘मां, कहां हैं? पहले उन से बात कर लूं.’’

‘‘जी, मां भी हैं, सब्जी ले रही हैं, अभी बुलाती हूं,’’ कह कर लड़की ने मां को आवाज दी थी.’’

एक महिला, जो देखने में ग्रामीण सी तो प्रतीत हो रही थी, हाथ में सब्जी का थैला लिए आती हुई दिखी.

‘‘म्हारो नाम सावित्रि है. या म्हारी छोरी गीता है, यहां कोचिंग कररी है. बड़ी छोरी माया और कंवर साहब भी पास ही रेवें. उन के पास ही हम थे पर अब बेटी के घर भी कब तक रहें तो कमरा देख रिया हैं,’’ हिंदी और लोकभाषा के मिश्रण में उस महिला ने अपनी बात रखी थी.

जया ध्यान से देखती रही, बोली, ‘‘पिता क्या करते हैं?’’

‘‘मेरे पापा का दूध का बिजनैस है गांव में. गाय, भैंसें, जमीन, मकान सब हैं. रामस्वरूप नाम है. कभीकभी वे मिलने आएंगे,’’ अब बेटी ने जवाब दिया था.

‘‘ठीक है, कमरा देख लो.’’

जया ने फिर नौकरानी बिंदिया को आवाज लगाई थी और कमरा दिखाने को कह दिया था.

किराया तो बहुत ही कम था. सावित्री ने स्वयं ही धोपोंछ कर कमरे की सफाई कर दी थी. फिर दोनों मांबेटी औटो में अपना सामान ले कर आ गई थीं.

जया ने उन को सब समझा दिया था, ‘‘मैं यहीं रहती हूं लेकिन कभीकभार बाहर जाना होता है तो आप लोग घर का ध्यान रखिए. माली समय पर आ कर पौधों की देखभाल करता है या नहीं नौकरानी ठीक से साफसफाई कर रही है और बिजली, पानी के बिल संभाल लेना.’’

‘‘आप चिंता मत करो आंटीजी, मम्मी सब संभाल लेंगी.’’

गीता तपाक से बोली तो सावित्री ने भी बात आगे बढ़ा कर कहा, ‘‘माली, नौकरानी की जरूरत कोई ना, म्हूं ही पौधों ना पानी डाल दूंगी और साफसफाई भी कर दूंगी.’’

जया अब कुछ निश्ंिचत हो गई थी. चलो, यह काम भी हुआ.

गीता तो अकसर अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती पर सावित्री को सफाई का शौक था तो जया के मना करने के बाद भी कभी छत की सफाई करती तो कभी सीढि़यों की झड़पोंछ कर देती.

सावित्री के यहां मेहमान के नाम पर बस बड़ी बेटी माया और उस के पति विजय का आनाजाना होता. हां, जब उन के दोनों बच्चे आते तब जरूर शोरगुल मचता. पर चलो, अब यह सब तो होगा ही. जया सोचती.

सावित्री का दामाद विजय शायद किसी जौहरी की दुकान पर काम करता था या उस की अपनी कोई दुकान थी, जया को यह ठीक से मालूम नहीं था लेकिन रहनसहन से लगता था कि अच्छी आमदनी है उन लोगों की. वैसे, स्कूटर पर ही आते वे लोग, कभीकभार एक कार भी ले कर आते. सावित्री खूब खातिर करती, कभी बाफले, लड्डू बनते तो कभी मक्की, बाजरे की रोटी.

जब पहली बार सावित्री मना करने के बाद भी उड़द के लड्डू, सरसों का साग और मक्की की रोटी जया के लिए ले कर आई तो अभय भी चौंके थे.

‘‘अरे, यह महिला तो लाजवाब खाना बनाती है. वाह, क्या लड्डू हैं और गरमागरम साग.’’

‘‘हां, देखो गांव की महिला है पर बेटी को पढ़ाने के लिए शहर में एक कमरा ले कर रह रही है. गांव में तो कह रही थी कि बहुत बड़ा मकान है उस का,’’ जया ने हां में हां मिलाते हुए कहा था.

‘‘वैसे, इस के पति क्या करते हैं?’’ अभय ने पूछा था.

‘‘दूध का बिजनैस है, यहां तो कम ही आते है, दोएक बार देखा था मैं ने मोटरसाइकिल पर, झुक कर प्रणाम कर रहे थे. अच्छे लंबेचौड़े हैं, रोबदार, बड़ी मूंछें.’’

‘‘अरे वाह, तुम ने तो पूरा वर्णन कर दिया,’’ अभय हंसे थे.

जया को सचमुच इस बात की खुशी थी कि स्वयं अनपढ़ होते हुए भी सावित्री बेटी की पढ़ाई का इतना ध्यान रख रही है. एक बार उस ने जया से कहा भी था-

‘‘दीदी, बड़ी बेटी तो नहीं पढ़ी तो छोटी उम्र में ब्या दी. पर या छोरी गीता पढ़ना चाहे तो म्हूं पढ़ा री हूं. 12वीं मां भी अच्छा नंबर लाई थी छोरी, पर गांव वाला बोले कि ब्या कर दो, हमारी जात में शादी कम उम्र में ही होती है, म्हारो भी बालविवाह था.’’

‘‘अच्छा चलो, यह भी अच्छा है कि इन के पिता भी इसे पढ़ाने के पक्ष में हैं, और इतना खर्चा कर रहे हैं, रिश्तेदारों की बात नहीं मान रहे,’’ जया ने तारीफ के स्वर में कहा था.

‘‘वी ही सारो खर्चा करे, म्हारी कया औकात,’’ कहते हुए सावित्री कुछ भावुक हो गई थी.

‘‘अरे, तो क्या हुआ, पिता है, दायित्व है उन का, तुम क्यों परेशान होती हो,’’ जया ने समझाया था.

धीरेधीरे सावित्री और गीता परिवार का हिस्सा बनते जा रहे थे. जब कोई काम होता तो दोनों सहयोग देतीं.

‘‘अरे आंटी, आप के पांव में तकलीफ है, आप क्यों यह भारी बैग उठा रही हैं, मैं ले जाती हं ऊपर.’’

गीता दौड़ कर आ जाती. आसपास से कोई छोटामोटा सामान मंगवाना होता तो सावित्री ले आती.

जया अब निश्ंिचत हो कर अभय के साथ टूर पर जा सकती थी.

पर इस बार जब वे लोग जयपुर से लौट रहे थे तभी माया के पति विजय का फोन आया, ‘‘आंटी, आप लोग कहां हो? जल्दी आइए, यहां बहुत गड़बड़ हो गई है, गीता के पिता आए हुए हैं, उन की आंख का औपरेशन हुआ है और गीता व उस की मां उन्हें घर के अंदर तक नहीं आने दे रही हैं, अब वे कहां जाएं?’’

‘‘क्या?’’ जया कुछ समझ नहीं पा रही थी. अभी परसों ही तो वे लोग आए हैं, तभी गीता के पिता को देखा था. मोटरसाइकिल पर दूध के बड़े बरतन रख कर सब से हंसहंस कर बात कर रहे थे.

अच्छेभले दिख रहे थे. अब औपरेशन भी हो गया और सावित्री कैसे मना कर देगी उन्हें अंदर आने से.

‘‘क्या हुआ?’’ गाड़ी चलाते हुए अभय ने पूछा था.

‘‘कुछ नहीं, घर चल कर देखते हैं?’’

फिर उस ने विजय से भी कहा था.

‘‘हम अभी घर पहुंच रहे हैं, फिर बात करेंगे.’’

घर पहुंच कर कमरा खोल कर वे लोग बैठे ही थे कि पास के कमरे से जोरजोर की आवाजें सुनाई

देने लगीं.’’

‘‘कौन बोल रहा है यह?’’ अभय ने गुस्से में पूछा.

‘‘पता नहीं, आवाज तो गीता के जीजाजी विजय की ही लग रही है, पर उसे इतनी जोर से चिल्लाते हुए तो कभी सुना नहीं,’’ जया को भी आश्चर्य हो रहा था.

तभी दरवाजे के बाहर आ कर विजय ने जोर से आवाज लगाई, ‘‘आंटी, आप जरा बाहर आएं.’’

‘‘क्या बात है?’’ अभय का गुस्सा अब और बढ़ गया था.

‘‘देखो, तुम अंदर आ कर बैठो और शांति से बताओ कि क्यों फोन कर रहे थे. इस तरह घर में शोरगुल मचाने की जरूरत नहीं है.’’

जया ने मामला शांत करना चाहा. तभी विजय एक बूढे़ से आदमी, जिस की आंख पर पट्टी बंधी थी, को ले कर अंदर आया, साथ में माया भी थी.

‘‘आंटी, इस आदमी को पहचानती हैं आप?’’ उस की आवाज में अभी भी तेजी थी.

‘‘नहीं, कौन है यह, और यहां क्या कर रहा है?’’ जया चौंकी थी.

‘‘आंटी, अंकल, ये हैं गीता के असली पिता, इन की आंख का औपरेशन होना था, वह तो हम ने किसी प्रकार करा दिया. अब गीता और उस की मां इन्हें यहां रखने तक को तैयार नहीं हैं,’’

विजय का स्वर फिर से ऊंचा होता जा रहा था.

‘‘अरे, मम्मी तो दरवाजा ही नहीं खोल रही थीं, मैं ने धमकी दी कि दरवाजा तोड़ दूंगी, तब डर से इन्होंने दरवाजा खोला.’’

माया कहे जा रही थी कि जया ने डांट कर उसे चुप कराया.

‘‘देखिए, अंकल अब आप किसी मुसीबत में न फंस जाएं इसलिए कहता हूं कि इन लोगों से कमरा खाली करवाइए, ऐसे चरित्रहीन व्यक्तियों को अपने घर में जगह न दें.’’

अभय के चेहरे के भाव देख कर जया भी डर गई थी. ये तो वैसे ही कमरा किसी को किराए पर देने के पक्ष में नहीं थे. उस पर अभय का घोर परंपरावादी स्वभाव.

तभी उस ने गीता और सावित्री को आवाज दे कर अंदर बुलाया.

गीता की आंखें रोरो कर सूज रही थीं और सावित्री ने भी सिर पर पल्लू ले कर चेहरा कुछ ढक रखा था.

‘‘गीता,’’ जया का स्वर भी अब कुछ कड़क हो गया था.

‘‘क्या यही तुम्हारे असली पिता हैं?’’ उस आदमी की तरफ इशारा करते हुए उस ने पूछा था.

‘‘जी आंटी, मुझे जन्म देने वाले,’’ कुछ सहम कर गीता ने जवाब दिया था.

‘‘औरऔर, वो कौन थे जो मिलने आते थे मोटरसाइकिल पर, जिन का तुम ने परिचय दिया था कि मेरे पापा हैं.’’

जया कुछ और कह पाती कि गीता ने बीच में ही रोक दिया.

‘‘मैं अपना असली पिता उन्हीं को मानती हूं, ये तो मेरे जन्म के बाद से ही हम लोगों को छोड़ गए थे पर उन्होंने ही हमें सहारा दिया, सारा खर्च उठाया, मुझे पढ़ा रहे हैं,’’ गीता अटकते स्वर में भर्राई आवाज में कहे जा रही थी और सावित्री अभी भी सहमी सी सिर ढके कोने में खड़ी थी.

जया ने अब माया की तरफ देखा.

‘‘माया, तुम तो इतने समय से यहां आ रही हो, विजय और बच्चे भी, तुम तो दूधवाले रामस्वरूप को जानती हो, तुम्हारे सामने भी कई बार आए थे, फिर?’’

‘‘नहीं आंटी, मैं और किसी को नहीं जानती. मैं तो, बस, अपने इन असली पिता को ही जानती हूं, हेमराज नाम हैं इन का, कनवास में रहते हैं, हमारे पिता हैं तो हम ने ही इन की आंख का औपरेशन कराया. अब बेटी के यहां तो अधिक दिन रह नहीं सकते पर मां…’’

जया को अब माया के सफेद झूठ पर आश्चर्य हो रहा था. इतनी कैसे बदल गई यह लड़की.

उधर, अब तक चुप खड़ी सावित्री का भी गुस्सा फूटा था.

‘‘पिछले बीस साल से कौन देखभाल कर रहा है, किस ने तेरा ब्याह कराया, किस ने तेरा घर बसाया, किस ने तेरे आदमी की नौकरी लगवाई, क्या तू नहीं जानती.’’

तब तक विजय फिर आगे बढ़ा था, ‘‘देखिए अंकलआटी, हम बस इन्हें ही जानते हैं. ये ही असली पिता हैं. अब आप इस चरित्रहीन महिला को घर से निकालिए वरना आप की बदनामी होगी, गांवभर में तो इन की हो ही रही है,’’ विजय की आवाज फिर ऊंची हो गई थी.

‘खामोश,’’ अभय के गुस्से को देख कर वह चुप हो गया था.

‘‘हम किसी को बाहर नहीं निकालेंगे. यह महिला और इन की बेटी सम्मान के साथ यहीं रहेंगी. कौन असली पिता है और कौन नहीं, हमें इस से मतलब नहीं और आप लोग अब जा सकते हैं,’’ अभय की इतनी कड़कती आवाज जया ने भी पहली बार सुनी थी. अभय के कड़कते स्वर से डर कर विजय, माया और हेमराज कमरे से बाहर निकल गए थे.

‘‘बहनजी,’’ अभय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘यहां से आप को कोई नहीं निकाल सकता, आप आराम से रहिए और बेटी को पढ़ाइए.’’ कह कर अभय अंदर चले गए थे.

सावित्री अब फूटफूट कर रो पड़ी थी, एक प्रकार से जया के पैरों पर वह गिर पड़ी थी.

‘‘दीदी, आप लोगों ने हमारी लाज रख ली, बेटी और दामाद तो हमें बेघर कर के बेइज्जत करने पर ही तुले थे.’’ सावित्री की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे.

‘‘आप शांत हो जाएं, कोई आप को बेघर नहीं करेगा, पर आश्चर्य है कि दामाद भले ही बदल जाए पर आप की स्वयं की बेटी…’’ जया यह कहे बिना न रह सकी.

‘‘वही तो दीदी, अब हमारे जमाई साब बड़े आदमी बन गए हैं. समाज में उन की इज्जत है और हम चरित्रहीन हो गए. क्या ये नहीं जानते कि गीता के जन्म के बाद से ही किस ने हमें सहारा दिया. हेमराज तो उसी समय घर छोड़ कर भाग गया था, 2 छोटी बेटियां और अकेली मैं कैसे रहती, कहां जाती. तब इन्हीं रामस्वरूपजी ने हमें सहारा दिया.

माया की शादी की, यहां तक कि उस की ननदों तक को मायरा इन्होंने दिया, विजय को नौकरी से लगाया, उस का घर बनवाया और अब गीता की पढ़ाई का खर्चा वे ही उठा रहे हैं. तो गीता तो इन्हें ही अपना असली पिता मानेगी न,’’ कहते हुए सावित्री का गला फिर रुंध गया था और जया अभी तक समझ नहीं पा रही थी कि कोखजाई बेटी, जिस के ऊपर इतने एहसान हैं, वक्त बदलते ही आज अपनी उसी मां को चरित्रहीन कहने को तत्पर हो गई.