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गाजीपुर: बालि सुग्रीव लड़ाई, बालिवध, सीता हनुमान मिलन, लंका दहन लीला का मंचन देख दर्शक हुए रोमांचित

गाजीपुर न्यूज़ टीम, गाजीपुर अति प्राचीन रामलीला कमेटी के तत्वावधान में लीला के बारहवे दिन 6 अक्टूबर दिन रविवार सायं 7 बजे स्थानीय लंका मैदान में बालि सुग्रीव- लड़ाई, बालिवध सीता हनुमान मिलन, लंका दहन लीला का मंचन पूरी भव्यता के साथ किया गया। मंचन में दर्शाया गया कि सीता की खोज करते हुए श्रीराम ऋष्यमूक पर्वत पहुंचकर हनुमान के साथ बानरराज सुग्रीव से मित्रता करते है और सुग्रीव से बालि द्वारा सताये जाने  के सम्बन्ध में सुनते है और वे बालि से युद्ध करने के लिए भेजते है। सुग्रीव श्रीराम के आज्ञा पर बालि के पास जाकर युद्ध के लिए ललकारते हुए युद्ध करने पर बालि को विवश कर देता हैं। और दोनो भाईयो में युद्ध शुरू हो जाता है। युद्ध के दौरान बालि सुग्रीव को बुरी तरह मार कर घायल कर देता है। 

मार खाकर सुग्रीव श्रीराम के पास आते है उसकी दशा देखकर श्रीराम ने उसकी पहचान के लिए माला देकर पुनः भेजते है।  सुग्रीव बालि के पास जाकर युद्ध के लिए फिर ललकारता है। उसकी ललकार सुनकर बालि ने कहा कायर तूँ फिर आ गया अब मै तुम्हे छोड़ूगा नही। वह सुग्रीव को जमीन पर पटक का पीटता है। श्रीराम ने सोचा कि बालि बहुत ही बलशाली है अतः एक वट वृक्ष के पीछे से  श्रीराम बालि कोे तीर से मार देते है। बालि बेहोशी हालत में जमीन पर गिर जाता है। इतने में श्रीराम उसके सामने आते है बालि ने उन्हे देखकर कहा कि मै बैरी सुग्रीव पिआरा कारन कवन नाथ माहि मारा। धर्म हेतु अवतरेऊ गोसाई मारहि मोहि ब्याध की नाई। 

हे नाथ मेरी लड़ाई सुग्रीव से थी, आपका मै क्या बिगाड़ा था जो बीच में आकर एक बहेलियो की तरह पेड़ का सहारा लेकर आपने हमें मारा। श्रीराम ने कहा कि अनुज वधु भगिनी सुत नारी, सुन सठ ए सम कन्या चारी। इनहि कुदृष्टि विलोकहि जोई ताहि बधे कछु पाप ना होई। जिसका कर्म गंदा हो उसका वध करने पर पाप नही होता है। अन्त में श्रीराम से बालि कहता है कि मेरा बेटा अंगद है इसको अपने शरण में लेलिजीये इतना कहने के बाद श्रीराम के चरणों में अपने शरीर को वह त्याग देता है। बालि के मरने के बाद किष्किन्धा का राज्य श्रीराम ने लक्ष्मण को भेजकर सुग्रीव को सौप देते है। सुग्रीव किष्किन्धा के राजपाट को सम्हालने लगा। 

कुछ समय बीतने पर किष्किधा नरेश सुग्रीव वानरी सेना की सभा राज दरवार में बुलाते है और श्रीराम का कार्य करने के लिए जामवंत अंगद नील, नल आदि वानरो की सेना को इकट्ठा करके एवं हनुमान से सीता की  खोज के लिए सभी दिशाओं में भेज देते है। वानरी सेना चारो दिशाओ में जाती है। हनुमान हवा के वेग से आकाश मार्ग से उडते हुए भारी समुद्र को पार करते हुए लंका पहुचकर रावण के दरवार में आते है। 

रावण द्वारा श्री हनुमान के पूंछ में तेल डालकर आग लगा दी जाती है। हनुमान जी अपने पुछ में आग लगा देखकर कूद- कूद कर सोने की लंका को जला कर राख कर देते है। इसके बाद अपने पुछ की आग समुद्र में जाकर बुझाकर माता सीता के पास जाकर उनसे मिलते है तथा उन्हे श्रीराम के आने की सूचना बताते है और सीता जी से निशानी स्वरूप चूड़ामणि लेकर श्रीराम के दरबार में उपस्थित होते है। इस मौके पर कमेटी के अध्यक्ष दीनानाथ गुप्ता, मंत्री ओ0पी0 तिवारी, उर्फ बच्चा, उपमंत्री लव कुमार त्रिवेदी, प्रबन्धक वीरेशराम वर्मा, स0 प्रबन्धक शिवपूजन तिवारी, (पहलवान),श्रवण कुमार गुप्ता, पं0 बाल गोविन्द दत्त त्रिवेदी उर्फ राजन भैया, राहुल वर्मा, उर्फ जेकी, रोहित कुमार अग्रवाल, राजकुमार शर्मा, कृष्ण बिहारी त्रिवेदी, कुशकुमार, अजय चतुर्वेदी उपस्थित रहे।

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